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स्व. श्री शरद जोशी ने लिखा

मैंने उन हज़ारों मोहित श्रोताओं को देखा है जो अशोक चक्रधर के कविता-पाठ के समय एक सहज मुस्कान के साथ ठहाका लगाते हैं और उनकी कविता के दर्द को अपने अंतर में गहराई से अनुभव करते हैं, उसे जीते हैं। मैं कई बार मंच पर बैठा अशोक चक्रधर के गहरे प्रभाव का कारण तलाशता रहा हूं। मुझे लगता है, रचना में आम आदमी की पक्षधरता के अतिरिक्त क्या कारण हो सकता है?

वे कविसम्मेलन को स्तरीयता प्रदान करने के साथ-साथ भाषा की सामर्थ्य भी बार-बार स्थापित करते हैं। मैं जब उन्हें सुनता हूं, मुझे लगता है मैं गहरे सामाजिक यथार्थ से उभरा एक वृत्तचित्र देख रहा हूं। अशोक की कहन में बड़ी शक्ति है और यही हमारी भाषा की, हमारे देश और हमारी जनता की शक्ति है।

यहां कुछ और

मुस्कान के साथ ठहाका लगाते हैं और उनकी कविता के दर्द को अपने अंतर में गहराई से अनुभव करते हैं, उसे जीते हैं। मैं कई बार मंच पर बैठा अशोक चक्रधर के गहरे प्रभाव का कारण तलाशता रहा हूं। मुझे लगता है, रचना में आम आदमी की पक्षधरता के अतिरिक्त क्या कारण हो सकता है?

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