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छाया के बाद Literary criticism

छायावाद के बाद हिंदी काव्य के विकास की गतिविधि कुछ इतनी चमत्कारपूर्ण और विविधतामयी रही है कि उसे वर्षों और परिस्थितियों के तालमेल में अनुबद्घ करना असंभव-सा है। इस काल में प्रारंभ से ही बहिर्मुखी और अंतर्मुखी काव्य-चेतना का संघर्ष चलता रहा है। दोनों धाराएं अपने कथ्य के अनुकूल भाषा, छंद, काव्यरूप और सृजनशैली की उपलब्धि के लिए नवनवीन प्रयोगों द्वारा प्रयत्नशील रही हैं। प्रयोग सभी ने किए हैं- चाहे प्रगतिशील हों, प्रयोगवादी हों या नई कवितावादी। भाषा भी तदनुरूप अपने सहज-स्वाभाविक विकास-पथ पर अग्रसर हुई है। यह प्रयोगधर्मिता का ही परिणाम है कि काव्यभाषा में जनबोलियों से प्राप्त और जनसाधारण द्वारा प्रयुक्त शब्दों में नए अर्थ-अनुषंग भरे गए हैं। यह पुस्तक छायावाद के बाद की काव्य-उपलब्धि, उसके बहुमुखी विकास, उसकी चेतना, कला और भाषा के नवीन रूपों की एक झांकी प्रस्तुत करती है। पुस्तक में कविताओं के पाठ का संपादन मुजीब रिज़वी के साथ अशोक चक्रधर ने किया, लेकिन छायावादोत्तर कविता के बारे में अशोक चक्रधर की लगभग पचास पृष्ठीय भूमिका इस पुस्तक को एक महत्वपूर्ण समीक्षा कृति बना देती है।

छायावाद के बाद हिंदी काव्य के विकास की गतिविधि कुछ इतनी चमत्कारपूर्ण और विविधतामयी रही है कि उसे वर्षों और परिस्थितियों के तालमेल में अनुबद्घ करना असंभव-सा है। इस काल में प्रारंभ से ही बहिर्मुखी और अंतर्मुखी काव्य-चेतना का संघर्ष चलता रहा है। दोनों धाराएं अपने कथ्य के अनुकूल भाषा, छंद, काव्यरूप और सृजनशैली की उपलब्धि के लिए नवनवीन प्रयोगों द्वारा प्रयत्नशील रही हैं।..."