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  • थोड़ा अफ़रा थोड़ी तफ़री
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    थोड़ा अफ़रा थोड़ी तफ़री

     

    —चौं रे चम्पू! हिन्दी कौ सराध पक्स सुरू है गयौ का?

    —क्या चचा! आप तो आम तौर से उल्टी बात बोलते नहीं हैं, क्या हो गया आपको? ये हिन्दी के श्राद्ध के नहीं, हिन्दी के प्रति श्रद्धा के दिन हैं।

    —अरे मैंनैं कब कही हिन्दी के सराध की बात? मैं तो सराध पक्स की कह रह्यौ ऊं। इन दिनन हिन्दी के पंडन की मौज है जायौ करै न!

    —चचा तुम्हारी इस बात में भी कोई बढ़िया चिंतन दिखाई नहीं दे रहा। पंडे किस क्षेत्र में नहीं होते! माना हिन्दी को हर दिन कमज़ोर करने की अदृश्य शक्तियां भी सक्रिय रहती हैं, लेकिन हिन्दी की ताक़त तो अपने आप बढ़ती जा रही है। युवाओं के मन में हिन्दी और अंग्रेज़ी का वैर-भाव मिट रहा है, यह बातकुछ पंडों को हज़म नहीं हो रही तो क्या करें!

    —अरे हिन्दी कौ मेलाऊ तौ हैबे वारौ ऐ दक्खिन अफरीका में!

    —हां चचा, जोहान्सबर्ग में बाईस से चौबीस सितम्बर तक नवां विश्व हिन्दी सम्मेलन होने वाला है, उसी के लिए अफरा-तफरी मची हुई है। कुछ हिन्दी केअफारे के कारण अफराए हुए हैं, सरकारी पैसे पर तफराना चाहते हैं। कोई बुराई नहीं है। वहां जाएंगे तो हिन्दी-हिन्दी तो गाएंगे ही गाएंगे।

    —लल्ला! इन सम्मेलनन कौ कछू फायदा ऊ होय कै नायं?

    —हर चीज फ़ायदे-नुकसान से नहीं देखी जाती चचा। हमारी आलोचनात्मक निन्दा-दृष्टि हर चीज़ में बुराई देखने की अभ्यासी है। अगर-मगर में अगर न जाएं तो ये सोचें कि हमारा देश मेलों-त्यौहारों का देश है। हिन्दी का कुम्भ लगे तो बुराई क्या है? अब हिन्दी तेज़ी से ग्लोबल होती हुई दिखाई दे रही है। मैं भी जा रहाहूं वहां, पर इस बार ज़िम्मेदारी कोई विशेष नहीं है। जो काम दिया जाएगा, करूंगा। विद्वानों की चर्चाएं सुनूंगा।

    —तौ किन बिसयन पै बात होयगी?

    —-सम्मेलन चूंकि जोहान्सबर्ग में होगा, इसलिए ज़ाहिर सी बात है कि महात्मा गांधी के भाषा, शिक्षा, संस्कृति, साहित्य से जुड़े हुए विचारों को खंगाला जाएगा। केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के हमारे प्रो. ज्ञानम ने एक बड़ी अच्छी पुस्तक बनाई है, जिसमें गांधी जी की शिक्षा, भाषा आदि सूक्तियों को इकट्ठा किया गया है। एक बड़ी प्यारी सी भूमिका लिखी है। फिर बात निश्चित रूप से होनी चाहिए फिल्म, रंगमंच और मंचीय कविता की, प्रस्तुति कलाओं की भाषा की, सम्प्रेषण की। मीडिया, प्रवासी साहित्य, अनुवाद और शिक्षण प्रविधियों पर बात होगी। कविसम्मेलन होगा, सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे। सूचना प्रौद्यौगिकी पर पिछले अनेक वर्ष से बात होती आ रही है, इस बार के सत्र में नए आविष्कारों पर चर्चा होनी चाहिए। मौक़ा मिला तो मैं चर्चा करने जा रहा हूं ’निकष’ की।

    —निकष माने कसौटी?

    —हां, निकष माने कसौटी। दरसल यह हिन्दी भाषा की दक्षता का एक ऑनलाइन टैस्ट होगा। विशेष रूप से विदेशियों के लिए। परीक्षा का पूरा नाम अंग्रेज़ी में है, ’नेशनल एंड इंटरनेशनल नॉलिज एक्रेडीटेशन स्टैंडर्ड्स फॉर हिन्दी’। इसी का लघु नाम है ‘निकष’। एक ऐसी कसौटी बनाई जाए जिससे हिंदी बोलने, सुनने, लिखने और पढ़ने की दक्षताओं की परीक्षा हो सके। मेरी कामना है कि ‘निकष’ की प्रस्तावना पर विदेशों से आए हुए विद्वान अपनी प्रतिक्रिया दें औरबताएं कि इस परिकल्पना को कैसे साकार किया जाए। केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के प्रोफेसर साहबान जाएंगे।  लौट कर काम को आगे बढ़ाएंगे। लेकिन काम टेढ़ा है।

    —टेढ़ौ चौं ऐ रे?

    —क्योंकि चारों प्रकार की दक्षताओं के लिए जिस प्रकार के सॉफ़्टवेयर हमें चाहिए, वे अभी अपनी पूर्णता में उपलब्ध नहीं हैं। बोलने, सुनने, लिखने और पढ़ने की ऑनलाइन परीक्षा के लिए एक टैक्स्ट टू स्पीच, दूसरा स्पीच टू टैक्स्ट और एक ओसीआर यानी ऑप्टिकल करैक्टर रिकग्नाइज़र चाहिए। ई-लर्निंग के नए सॉफ़्टवेयर भी बनाने होंगे।

    —नैंकु हिन्दी ऊ बोलि लै!

    —यही है आज की हिन्दी। सबको समझ में आती है। तुम भी न समझने का ढोंग मत करो चचा। क्लिष्ट अनुवाद की हिन्दी अब चलने वाली नहीं है। ख़ैर, सबकेपास अपनी ढपली हैं, अपने राग-विराग हैं। मेले में देखते हैं क्या होने वाला है। माहौल थोड़ा अफरा रहेगा, थोड़ी तफरी रहेगी। फिलहाल तो जाने की अफ़रा-तफ़री है।

    wonderful comments!

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