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  • शाम के डबडबाए हुए डार्क में
  • शाम के डबडबाए हुए डार्क में

    20110201 Sham ke dabdabaye huye dark meinइमारतों से घिरे छोटे से पार्क में,

    दो चालीस-पैंतालीसिए बतिया रहे थे

    शाम के झुटपुटे के डबडबाए डार्क में।

     

    तू बेसिकली सिक है,

    महानगर का मानसिक है।

    सेंटीमेंटल से ज़्यादा मेंटीसेंटल है,

    तेरी प्रॉबलम दिमाग में डेन्टल है।

    खाए जा रहे हैं तनावों के दांत,

    सूख गई हैं भावनाओं की आंत।

    तनाव न हों तो तेरी ज़िन्दगी

    बेमज़ा हो जाय,

    सुकून तो जैसे सज़ा हो जाय।

    अपने सुखों से नहीं है नाता,

    दूसरों का सुख

    तुझसे देखा नहीं जाता।

     

    दूसरा बोला— और तेरा ध्यान किधर है?

    क्या उधर है, तेरा नौनिहाल जिधर है?

    किधर जा रही है तेरी दसनिहाली?

    दोस्त हैं उसके

    इसी मोहल्ले के मवाली।

    किशोरों के शरीरों में

    नया-नया शराबी शोरशराबा है,

    दैहिक ज्ञान बेहिसाबा है।

    ये देख कर तेरा दिल नहीं दहला?

     

    इस पर बोला पहला—

    भाईजान,

    खुंदकों की खंदक मत खोदो,

    बच्चों की फुलवारी में

    हंसी के बीज बो दो।

    तुम और तुम्हारी रानी,

    मिल कर करो

    अपनी फुलवारी की निगरानी।

    नसीहत न दो मेरे बच्चों के चाचा,

    क्या तुमने अपने बचपन में

    देह का भूगोल नहीं बाँचा?

    wonderful comments!

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