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    सच्चे यही शिवाले हैं

    (वृक्ष सचमुच शंकर भगवान के अनुयायी लगते हैं)

     

    तरह-तरह के

    फल पाए जो

    वो समझो

    इनके वरदान,

    निर्धन का घर

    बन जाते हैं

    छत करते हैं

    मुफ़्त प्रदान।

    थके पथिक को

    छाया देते

    नहीं किराया लेते हैं,

    कृपा लुटाते सदा वृक्ष

    ऐसे जैसे शंकर भगवान।

     

    जहां खड़े हैं,

    वहीं खड़े हैं

    क्या तुलना

    इनके तप की,

    शीतल मंद समीर बहाकर

    देते हैं सबको थपकी।

    मधु वसंत के

    वस्त्र पहनकर

    अपने सारे अस्त्रों से,

    हर ली हरि ने

    हर विपदा

    जो माता धरती पर लपकी।

     

    कड़े तने से

    कपड़े बनते

    वैसे तन से काले हैं,

    भीतर-भीतर हैं कठोर

    पर ऊपर से

    हरियाले हैं,

    चिडि़यां यश गाथाएं गातीं

    बादल जिनको नहलाते,

    सच्ची बात यही है

    प्यारे

    सच्चे यही शिवाले हैं।

    wonderful comments!

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