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  • मटियामेट हो गई जवाबदेही
  • मटियामेट हो गई जवाबदेही

    —चौं रे चम्पू! हम अपने जल, जंगल और जमीन कौ ध्यान चौं नांय रक्खैं?

    —धरती कब से हमारा ध्यान रखती आई है, पर हमने उसके साथ खिलवाड़ किया। कबाड़ा किया और कबाड़ दिया। किवाड़ नहीं खोले दिमाग़ के। मिजाज़ नहीं समझे आग के! उत्तराखंड की आग का क्या उत्तर दोगे धरती को?

    —तोय अपने पिताजी की धरती वारी कबता याद ऐ?

    —सिंहावलोकन शैली में ब्रजभाषा की अद्भुत कविता है वो। लम्बी है। चलिए, एक पद सुनाता हूं, ’मैया सुख देवै और दुख हमारौ हरती, हरती हमारौ दुख, सुध न बिसरती, बिसरती जो सुध तौ ना काउ तरह सरती, सरती न, और बात बनी ऊ बिगरती, बिगरती जु बात, नायं कैसै ऊ सुधरती, धरती न ध्यान जो हमारौ कहूं धरती।’ उत्तराखंड में बिगड़ी हुई बात कैसे भी नहीं सुधर सकती। एक महीने के अंदर एक हज़ार से ज़्यादा आग की घटनाएं हुई हैं। लगभग दो हज़ार हैक्टेयर वनखंड स्वाहा हो चुका है। आग ऑक्सीजन और सीज़न निगलती है, धुआं और धूल उगलती है और हमारी ग़लती से असमय बर्फ़ गलती है।

    —आग लगी कैसै?

    —आग लगी प्रकृति के संकेतों की उपेक्षा से। पता था कि अब ऋतुएं गड़बड़ा गई हैं। इस साल रही शीतकालीन बरसात में कमी। धरती में बची ही नहीं नमी। भीषण गर्मी से सूख गए पत्ते, जो चढ़ गए सूरज के हत्थे। पहले जंगल वहां के लोगों का अपना था, अब तो बस शहर का ही सपना था। जंगल से लेना नहीं सीखा, और उन्हें विध्वंस का आगमन नहीं दीखा। शहरों के लिए मास्टर प्लान बनते हैं वहां, पर जंगल सुरक्षा के लिए उस स्तर पर कहां? सुरक्षा को अगर स्थाई याद बना लेते, सूखने से पहले अगर पत्तों की खाद बना लेते, तो जंगल में ही मंगलकारी कारोबार होता। अपना पैदा किया हुआ रोज़गार होता। पर धन्य हैं हमारे जंगल अभियंता! सरकारी नीति-नियंता! कोई विधायक घोड़े की टांग तोड़ता है, कोई कुर्सी नहीं छोड़ता है, पर जंगल की ओर ध्यान कोई नहीं मोड़ता है। सिमट गए जंगल-सनेही, मटियामेट हो गई जवाबदेही।

    —हम धरती कौ ध्यान नायं रखिंगे, तौ वो हमाऔ ध्यान कैसै रक्खैगी, बताऔ!

    wonderful comments!

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