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  • गए गावतकिए नए चावचकिए
  • गए गावतकिए नए चावचकिए

    —चौं रे चम्पू! बरसन ते हम कबीसम्मेलन में नायं गए। मोय चौं नायं बुलावै?

    —पिछले दस साल में कविसम्मेलन बहुत बदल गए हैं चचा। पता नहीं आपको कैसे लगें!

    —ख़राब है गए कै अच्छे भए?

    —मंच पर अच्छी कविता के मानक बदल रहे हैं। अनेक अच्छे कवि मंच पर आए, वक्त की आंधियों से प्रभावित नहीं हुए, भले ही उन्हें कम निमंत्रण मिलें।

    —तू तौ हर दिन उड़्यौ फिरै, तू अच्छौ कबी नायं ऐ का?

    —पता नहीं चचा! मेरे अंदर का नाटककार, कथाकार और मीडियाकर्मी मुझे मंच पर जमाए रखता है। अब वरिष्ठों में गणना होने लगी है, इसलिए मांग कम नहीं हुई, आपकी कृपा से बढ़ती जा रही है। अच्छी कविताएं सुनने को मिल जाएं तो प्रसन्न हो जाता हूं, न मिलें तो कवियों से मिलकर प्रसन्न हो जाता हूं, जो पीछे कुछ भी कहें, पर सामने पर्याप्त से अधिक आदर-मान देते हैं।

    —तौ का फरक आयौ ऐ इन दस सालन में?

    —देश के बड़े कविसम्मेलन अब एक कॉरपोरेट ईवैंट हो गए हैं। गद्दों की बिछावट और गावतकियों के दिन गए, उनके स्थान पर सोफ़े या कुर्सियां होती हैं। जब गावतकिए होते थे तो मंच का दिल बड़ा होता था, उसमें स्थानीय कवि भी समा जाते थे। नगर की प्रतिभाओं को न केवल प्रोत्साहन मिलता था, बल्कि एक प्रकार से सम्मेलन में नगर की रचनात्मक सहभागिता हो जाया करती थी।

    —अब चौं नायं बुलामैं?

    —स्थानीय कवि अखाड़ेबाज़, मजमेबाज़ और लतीफ़ाख़ोर नहीं होते, इसलिए मंच पर उस प्रकार नहीं जम पाते थे जितना कि बाहर के लोकप्रिय कवि। निर्मम कॉरपोरेट ने स्थानीय कवियों के लिए द्वार बंद कर दिए और द्वार पर अपने सिक्योरिटी गार्ड्स नियुक्त कर दिए। कॉरपोरेट के व्यवस्थापक सेनानियों के लिए कविसम्मेलन दूसरे ईवैंट्स जैसा ही ईवैंट है। उनके लिए सब परफॉर्मर हैं। उन्हें तो अधिकतम जनता के सामने अधिकतम मनोरंजन परोसना है।

    —सोफा कब ते आए मंच पै?

    —सोफ़े लाने का श्रेय पुराने कवियों को दिया जा सकता है। नीरज जी, उदय प्रताप सिंह जी, सुरेंद्र शर्मा जी को पालती मार कर बैठने में परेशानी होने लगी तो गद्दे गावतकियों के साथ मध्य में या किनारों पर सोफ़े डाले जाने लगे। सन तेरह में साइकिल दुर्घटना में मेरे पैर में चोट लगी तो मैं भी किनारे पर कुर्सी की मांग करने लगा। यह दृश्य सामने से उतना अच्छा नहीं लगता था, इसलिए सभी के लिए सोफ़े बिछाए जाने लगे और इस तरह बड़े नगरों के आयोजनों में गावतकिए अनावश्यक हो गए। चावचकिए कवियों का सोफ़ायुग आ गया।

    —सोफायुग के फायदा बता?

    —मसनदों पर कवि आड़े-तिरछे बैठा करते थे। कोई अर्धलेटामुद्रा में तो कोई पूरा लमलेट। अब सोफ़े-कुर्सी पर तनकर बैठे नज़र आने लगे हैं। क्या सुनाएंगे इस बात को लेकर प्रायः तनाव में नहीं रहते। आधा घंटे की प्रस्तुति उनके मन में सैट रहती है, जिसमें कोई कटौती नहीं करते। जनतंत्र में उन सीनियर कवियों को ज़्यादा समय क्यों मिले, जिनका एलपीएम और सीपीएम कम है।

    —एलपीएम और सीपीएम?

    —लाफ़्टर पर मिनिट और क्लैपिंग पर मिनिट। उनके माल में अस्सी प्रतिशत पराया और पुराना माल होता है, जिसका वे थोड़ा नवीनीकरण कर देते हैं। बीस प्रतिशत में कोई कविता सुना देते हैं, जिसमें बेरोज़गारी, असमानता, ग़रीबी, महंगाई, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे कम हो गए हैं, हमारे संस्कार, देश-प्रेम, देशद्रोह, मां, पति-पत्नी प्रकरण और प्रेम-प्रसंगों पर ज़ोर बढ़ गया है। किसने किसकी सुना दी, इस बात पर झग़ड़े नहीं होते, शांतिपूर्ण सहअस्तित्व रहता है, क्योंकि कवि कोई, माल वोई!

    —और बता!

    —एक फ़ायदा यह कि मसनदों के पीछे जो रेतभरे पीकदान रखे रहते थे, वे ग़ायब हो गए। मंच पर बीड़ी-सिगरेट, पान-तम्बाकू लगभग बंद हो गया। अगला फ़ायदा यह कि मंच पर त्वरित संपर्कवर्धन चलता रहता है। कवि अपने-अपने मोबाइलों पर व्यस्त रहते हैं। पल-पल पर फ़ोटो अपडेट। वॉट्सएप पर अन्य कवियों से चैट। माइक पर कवि क्या सुना रहा है, इस यातना से बच जाते हैं। एक युवा कवि ने इसका भी तोड़ निकाल लिया। उसने स्टैंडिंग माइक हटाकर हाथ में कॉर्डलैस माइक थाम लिया। अब वह पूरे मंच पर टहल-टहल कर सुनाता है। आगे भी देखता है और पीछे भी। जब पीछे देखता है तो डिजिटल-कवि आपस के लिहाज में अपने-अपने मोबाइल हथेली पर औंधे कर लेते हैं।

    —और फायदा बता।

    —कॉरपोरेट अनुशासन में चाकचौबंद चावचकिए कवि दारू पीकर औंधे नहीं दिखते अब।

    wonderful comments!