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  • ऐ युग तुझे सौ-सौ नमस्कार
  • ऐ युग तुझे सौ-सौ नमस्कार

    ऐ युग तुझे सौ-सौ नमस्कार

     

    —चौं रे चम्पू! परसों मैंनै बड़ौ इंतजार कियौ बगीची पै, चौं नायं आयौ?

    —चचा, परसों मेरे पिताजी का जन्मदिन था। ऐसा नहीं कि उनका जन्मदिन समारोहपूर्वक मनाया गया हो। बस मैं अपने कार्यालय में आया। शिवरात्रि की छुट्टी थी। कार्यालय में अकेला था। बहुत देर तक उनके चित्र को निहारता रहा। बैठा रहा बहुत देर तक। फिर रैक से उनकी किताबेंनिकालकर पलटने लगा। कविताओं और स्मृतियों में डूब गया। बचपन से लेकर उनके जाने तक की यादें घुमड़ती रहीं। बहुत नेक, ईमानदार, कर्मठ, सच्चे, सबकी मदद करने वाले, ज़मीन से जुड़े हुए, निरभिमानी लेकिन स्वाभिमानी, शब्दों में यमक श्लेष के शोधक, कविता में प्रवाह और संप्रेषण केहामी, महत्वाकांक्षाओं से दूर,

    सरल से व्यक्ति थे। आवश्यकताओं के लिए लिखते रहे। रेडियो के लिए ख़ूब लिखा, पत्रिकाओं का संपादन किया, बच्चों के लिए लगभग सौ किताबें लिख दीं,

    पर अपने काव्य-संकलन प्रकाशित करने के मामले में सदा उदासीन रहे। निन्यानवै में उनके दिवंगत होने केबाद उनके तीन काव्य-संकलन प्रकाशित हुए।

    मैं जब तक उनकी छत्रछाया में रहा मुझे अपनी पितृभक्ति में बड़ा आनन्द आया। उनकी अपेक्षाएं कुछ हुआ ही नहीं करती थीं और उनके बड़प्पन को छूना नामुमकिन था चचा!

    —प्रगल्भ जी ते भौत अच्छी तरह परचित ऊं। सिरी राधेस्याम प्रगल्भ। प्रगल्भ बड़ौ मुस्किल नाम धर लियौ!

    —मुश्किल काम ही किया करते थे। कहते थे, ‘फिर उठें तूफ़ान हर रुख़ से, मैं नहीं डरता किसी दुख से, और सुख की बात ही क्या है, वह चला जाए बड़े सुख से।’

    इसी सप्ताह जयपुर गया था वहां एक सज्जन ने बताया कि शिव खेड़ा अपने व्याख्यान में उनकी पंक्तियां उद्धृत कर रहे थे, ‘दिन के उजेरेमें न करो कोई ऐसा काम, नींद जो न आए तुम्हें रात के अंधेरे में। रात के अंधेरे में न करो कोई ऐसा काम,

    मुंह जो तुम छिपाते फिरो दिन के उजेरे में।’

    —लल्ला प्रगल्भ जी की तौ बातई कछु और ई। तू हमें मत बताय। हमें सब सल ऐ। जब जब उनकी याद आवै तौ एक हूक सी उठै। उनकी ‘था और थी’ कबता याद ऐ तोय?

    —हां याद है! प्रेम कहानी के व्यावसायीकरण पर एक व्यंग्य है। ‘एक था, एक थी। था ने थी से मौहब्बत की। अफ़साना हो गया। दुश्मन सारा ज़माना हो गया। गली गली उन्हीं दो नामों के चर्चे, दीवार दीवार पर उन्हीं दो नामों के पर्चे। थी बेचारी क्या करे, जिए कि मरे? कह न सकी, सह न सकी,मर गई। एक बहुत लम्बी यात्रा, एक हिचकी में तय कर गई। था को न जाने क्या हो गया। उसे लगा जैसे सब कुछ खो गया। बेसुध सा, बीमार सा रहने लगा, और ज़माना उसको पागल कहने लगा। कभी कभी वो एकांत में चला जाता, कोमल कोमल उंगलियों से धरती के कागज़ पर थी का नामलिखता, उसी के चित्र बनाता, और जब कभी होंठो से उसके गीत गुनगुनाता, तो लोगों से पत्थरों की बौछार पाता। एक दिन आया, जब औषधि और सहानुभूति के अभाव ने उसको भी खाया।

    —यानी था ऊ मर गयौ?

    —हां चचा, था भी मर गया और कहानी ख़त्म हो गई। लेकिन कविता ख़त्म नहीं हुई।

    —आगे बता, आगे का भयौ!

    —संयोग से इस कहानी को एक फ़िल्मी प्रोड्यूसर ने फ़िल्मा दिया। अजी ग़ज़ब ढा दिया। लोग बेतहाशा फ़िल्म देखने जाने लगे। टिकिट पाने के लिए लम्बे-लम्बे क्यू लगाने लगे, और गली गली उसी फ़िल्म के गीत गाने लगे। कलाकारों ने भी चचा भूमिका कुछ इस ख़ूबी से निभाई, ग्लिसरीन आंखों मेंलगा-लगा कर आंसुओं की वो धारा बहाई, कि जनता को फ़िल्म ज़रूरत से ज़्यादा भाई।

    —हिट है गई होयगी फिलम!

    —हां, बिल्कुल चचा। परिणामत: हुआ ऐसा, फ़िल्म को नाम मिला, प्रोड्यूसर को पैसा। कलाकारों को मिला सम्मान। सरकार से पुरस्कार। सोचता हूं, कैसा ज़माना आ गया है… अब चचा, बाद में जो कहते हैं, वो मार्के की बात है।

    —का कही? बता!

    —वे कहते हैं, कैसा ज़माना आ गया है, नाटक को पुरस्कार, हकीक़त पर पत्थरों की बौछार, ऐ युग तुझे सौ-सौ नमस्कार।

    —लल्ला! प्रगल्भ जी कूं हमाए सौ-सौ नमस्कार!!

     

    wonderful comments!

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