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    अपराधी-सिपाही आत्मीय संवाद

    (सिपाहियों में बड़ी दूरदृष्टि होती है वे अपराधियों के झांसे में नहीं आते)

     

     

    जानकर सिपाही को भोला,

    अपराधी बोला—

    हवलदार जी!

    मूंछें आपकी

    लच्छेदार जी!

    अब तो आपने

    पकड़ ही लिया है,

    क़ानूनी शिकंजे में

    जकड़ ही लिया है।

    ये ज़िंदगी

    अब आपकी ज़िंदगी है,

    लेकिन इस व़क्त

    ज़रा

    बीड़ी की

    तलब लगी है।

    हे डंडानाथ!

    दो मिनिट में

    बीड़ी ले आऊं

    फिर चलता हूं

    आपके साथ।

     

    सिपाही झल्लाया—

    वाह,

    क्या आयडिया परोसा!

     

    अपराधी गिड़गिड़ाया-

    आपको,

    बिलकुल नहीं है भरोसा?

     

    सिपाही बोला—

    बच्चू!

    बीड़ी लेने जाएगा

    ताकि

    हो जाए उड़न छू।

    बेटा,

    तेरे झांसे में नहीं आऊंगा,

    तू यहीं ठहर

    बीड़ी लेने मैं जाऊंगा।

    wonderful comments!

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