Homepage>
  • chaure champu
  • >
  • अंड-बंड और टिकिट फ़ंड
  • अंड-बंड और टिकिट फ़ंड

    —चौं रे चम्पू! होरी पै लोग अंड-बंड चौं बोल्यौ करैं?

    –चचा, आपके प्रश्न में उत्तर है और उत्तर में उत्तराखंड। क्या अंड-बंड? घोड़ा शक्तिमान प्रचंड, पश्च वाम टांग खंड-खंड। आक्रामक षंड, हस्त तीव्र मारक दंड! राष्ट्रपति भवन-धायक विधायक अब पाते हैं, खाते ना अघाते मधुर श्री श्री श्रीखंड। सत्ता की अलबत्ता बिछी है बिसात, तेरी-मेरी क्या बिसात, रात में और सघन रात उद्दंड! क्या अंड-बंड? दंड का माप नहीं, माप का दंड नहीं, फिर क्या मापदंड? चचा, क्या अंड-बंड? चहुं-दिश पाप-खंड, पाप-शिलाखंड, महापाप-खंड, उपखंड, वनखंड, झार-झार खंड! गढ़ नहीं छत्तीसखंड। रुहेलगढ़ रुहेलखंड? बुंदेलगढ़ बुंदेलखंड? बुंदे, चूड़ी, हार-हमेलखंड। पूरी भेलखंड, खस्ता खेलखंड, रबड़ी रेलखंड, मलाई मेलखंड, तिलपट्टी तेलखंड, गुलाबजामुन गेलखंड, जलेबी जेलखंड। लेकर देकर नेकर, आकर जाकर पाकर, पाखंड। खंड-खंड-पाखंड, चचा क्या अंड-बंड? जल-मृत्यु, फ़जल-मृत्यु, अफ़जल-मृत्युदंड, किसको शर्मिंदा करे, जिसको शर्मिंदा करे, भूत को ज़िंदा करे, न्याय की निंदा करे, घोड़े की टांग जैसा ऊंट की पटांग विधि से तोड़ डाला राष्ट्र मेरुदंड। चचा, राष्ट्र-मेरुदंड। क्या अंड-बंड?

    —जे तौ अंड-बंड ते ऊ ऊपर की भासा ऐ रे। अंड-बंड तौ समझि में ऊ आय जाय पर आज तैनैं भांग जादाई पी राखी ऐ। तेरी उड़ान ऊंची ऐ।

    —चचा, इन दिनों उड़ान ऊंची है ‘मेकमेरीट्रिप’ की। ‘यशभारती’ सम्मान लेने मुझे लखनऊ जाना था। ‘मेकमेरीट्रिप’ से अपनी टिकिट करा ली थी। बाद में बोध हुआ कि आपकी बहूरानी को भी ले जाना चाहिए। अब सुनिए ‘दास्ताने टिकट ऑफ आपकी बहूरानी’ विद नो हैरानी! उनकी दिल्ली-लखनऊ-दिल्ली की टिकट बुक कराने के अनवरत प्रयास मैंने सोलह तारीख़ को किए, हज़ारीबाग़ के पत्रकारों से क्षमा मांगते हुए कि मित्रो, व्यस्त हूं, थोड़ा समय दीजिए।

    —फोन ई तौ कन्नौ परै एजैण्ट कूं? वामैं का परेसानी हती?

    —नहीं चचा, मैं लग गया ऑनलाइन बुकिंग में। नाम, कहां से, कहां तक, ई-मेल, फोन, पेमेंट मोड, क्रेडिट कार्ड नंबर, पिछवाड़े की तीन गोपनीय संख्याएं, राशि आठ हज़ार कुछ रुपए। हमको सब कुछ मंज़ूर। उन्हें पेमेंट-प्रविधि मंज़ूर। ओ.टी.पी., मतलब ‘वन टाइम पासवर्ड’ एसएमएस से मिला। भर दिया। नैक्स्ट क्लिक करते तो डन हो जाता। ऐसा ही होता आया था। मोबाइल पर पैसे कटने की टन्न आती और मेल से टनाटन्न टिकट आ जाती। लेकिन नहीं जी, ओ.टी.पी. भरते ही जब मैं नैक्स्ट का बटन छूने को हुआ तो वह ओ.टी.पी. गायब! यानी, अब दुबारा से भरिए। दोबारा वही सब दोहराया। बैंक की एक बार की ओ.टी.पी. आधा घंटा चलती है, लेकिन अंत तक आते आते फिर ग़ायब हो गई, लेकिन राशि नौ हज़ार कुछ रुपए हो छुकी थी। अब मेरे ज्ञानचक्षु खुले और षड़यंत्र समझ में आ गया। क्यों हो रहा है यह सब! कवायद फिर से की, फिर नई ओ.टी.पी.। पर अब साढ़े ग्यारह हज़ार की हो गई ये टिकट। हम फिर भी ख़रीदने को तैयार। ओ.टी.पी. छूते ही पुन: उड़नछू! डरते-डरते एक बार फिर दोहराया। दाम हो गए तेरह हज़ार से ऊपर। फिर कोई ऐरर आ गई और हम टैरर में आ गए! टिकिट फ़ंड लिमिट क्रॉस करता जा रहा था।

    —ऐसौ चौं भयौ?

    –वे जानना चाहते थे कि इसकी गर्ज कितनी है। वे समझ गए कि चम्पू अपनी पत्नी को साथ में ले जाना चाहता है, बढ़ाया हुआ पैसा दनादन मंज़ूर किए जा रहा है तो अब  कितने ही दाम क्यों न बढ़ा दो, टिकिट लेकर ही मानेगा। हरियाणा के जाट आंदोलन के समय भी लोगों की मजबूरी का फायदा उठाते हुए इन लोगों ने चण्डीगढ़ से दिल्ली की टिकट पैंतीस से साठ हज़ार तक कर दी थी। मैं जानता था कि इनके दाम हर किसी के लिए एक जैसे नहीं होते। मैंने अपने पुराने ट्रेवल एजेंट से पत्नी की टिकट कराई, उसने राशि ग्यारह हज़ार बताई, मैंने कहा ‘फौरन कर दे मेरे भाई’! सवाल ये है कि जिस प्रकार आपात्काल, प्राकृतिक संकट या युद्ध काल में करुणाविहीन, संवेदनशून्य जमाखोर व्यापारियों को देशद्रोही माना जाता है, उसी प्रकार क्या इन सीटों के जमाखोरों को देशद्रोही नहीं माना जाना चाहिए।

    —अरे, होरी पै मीठी बात कर।

    —ठीक है चचा, पत्नी के लिए ग्यारह लाख का यशभारती पुरस्कार लेकर आए हैं, ग्यारह हज़ार की टिकिट आ गई तो क्या बुरा हुआ। ग्यारह सौ रुपए एजेंट को भी ख़ुशी में दिए जा सकते हैं। एक सौ एक रुपए अपने बटुए के लिए काफ़ी हैं। ग्यारह रुपए होलिका मैया के प्रसाद के और…

    —और सवा रुपइया हमाई भांग के ताईं!!

    wonderful comments!