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  • हिन्दी के हाथों में सौ-सौ चूड़ियां
  • हिन्दी के हाथों में सौ-सौ चूड़ियां

     

     

    —चौं रे चम्पू! कोई नई ताजी है तेरे पास?

    —तुम तो बगीची से हिलते नहीं हो, लेकिन तुम्हारा ये चम्पू जगह-जगह घूमता रहता है और नई ताजी इकट्ठा करता ही रहता है। कौन सी बताऊं, सोच रहा हूं।

    —कोई ऐसी बात जो नीति की होय, न राजनीति की। भय की होय न प्रीति की।

    —फिर बचा ही क्या चचा? चलो भाषा के बारे में बताता हूं।

    —महाराष्ट्र  वारी हिन्दी बिरोध की बात नायं सुन्नी मोय।

    —राष्ट्र की बात करूंगा, न महाराष्ट्र की। मैं विदेशों में हिन्दी शिक्षण के बारे में बताता हूं।

    —चल बता।

    —भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद की ओर से अक्षरम का आठवां अंतरराष्ट्रीय हिन्दी उत्सव हुआ। उसमें एक सत्र था-  विदेशों में हिन्दी शिक्षण। हिन्दी पढ़ाने वाले विदेशी विद्वान भी थे और वो भी थे जिन्होंने विदेशों में जा कर हिन्दी पढ़ाई। दोनों ओर के अनुभवों का आमना-सामना बड़ा मजेदार था। यहां के विद्वान जब संस्थानों की बनाई हुई किताबें लेकर विदेश जाते हैं तो विदेशी छात्र कहते हैं हमें इन किताबों से नहीं दूसरे तरीकों से पढ़ाइए।

    —दूसरे कौन से तरीका?

    —दूसरे तरीके, यानी, फिल्मी संवादों और गीतों से पाठ्यक्रम बनाइए। छात्रों की बात माननी पड़ती है। निश्चित पाठ्यक्रम को लचीला बनाया जाता है और कही-कहीं तो उसे बिल्कुल छोड़ दिया जाता है। अभी तक विदेशों में हिन्दी शिक्षण के लिए कोई मानकीकृत पाठ्यक्रम नहीं बना है। केन्द्रीय हिन्दी संस्थान ने इस दिशा में कार्य किया है लेकिन इसी कारण पूरा नहीं हो पाया  क्योंकि अलग-अलग द्वीप समूहों के विभिन्न देशों में सांस्कृतिक विभिन्नताएं हैं। व्याकरण भी पढ़ाओ तो उस देश की भाषा की व्याकरण का समानांतर ज्ञान होना चाहिए। टैक्सस विश्वविद्यालय की हिन्दी उर्दू परियोजना से जुड़े प्रो. राजेश ने बताया कि मैं उर्दू का एक शेर सुना रहा था- ‘हुस्ने जाना की तारीफ मुमकिन नहीं।’ हिन्दी उर्दू का आधा अधूरा ज्ञान रखने वाली एक छात्रा ने पूछा कि हुस्न जब जाना चाहती है तो मुमकिन क्यों नहीं है। इसी तरह का एक उदाहरण विदेशों में हिन्दी शिक्षण का पर्याप्त अनुभव रखने वाले हरजेन्द्र चौधरी ने बताया। ये उदाहरण ज्यादा अच्छा था।

    —बता तो सही!

    —एक पाठ में संदर्भ था कि एक युवती की चूड़ियां टूट गईं और वह धाड़ मार-मार कर रो रही थी। छात्रा ने प्रश्न किया कि इतनी जोर से क्यों रही थी? क्या उसके पास पैसे नहीं थे। शिक्षक महोदय को उसे भारत के सामाजिक रीति-रिवाज समझाने में निश्चित रूप से समय लगा होगा। स्थितियों को तो समझाया जा सकता है, किंतु कई बार शब्दों के शब्दशः अनुवाद बताना कठिन होता है। डॉ. विमलेश कांति वर्मा को समस्या आई कि अमृत और चरणामृत शब्दों को किस प्रकार अनूदित किया जाए। इस तरह के संकल्पनात्मक शब्दों के लिए नए-नए कोश बनें तो बात बने।

    —विदेशी विद्वान का बोले?

    —एक थे प्रो. गेनादी श्लोम्पेर  उन्होंने बताया कि इज़राइल में हिन्दी के उपभोक्ता ज्यादातर पर्यटक लोग हैं उनके लिए जरूरी है वार्तालाप की भाषा को जानना। उन्होंने स्वयं हिब्रू हिन्दी के कोश बनाए हैं और नए वार्तालाप कोश पर कार्य चल रहा है। मॉस्को की तात्याना दुब्यांस्काया कहती थीं कि वहां के लड़के-लड़कियां हिन्दी फिल्मों  से आकृष्ट होते हैं, लड़कियां नृत्य सीखने की इच्छा में हिन्दी सीखती हैं। हिन्दी अभी तक प्रेम की भाषा है, प्रयोग की भाषा नहीं बन पाई, क्योंकि रोज़गार नहीं हैं। हिन्दी प्रसन्न करती है पर अन्नदाता भाषा नहीं है।

    —भौत ठीक कही!

    —एक प्रो. तात्याना ओरांस्काइया जर्मनी से आई थीं। उनका कहना था कि वैश्वीकरण के बाद भाषा और भारत विद्या को सीखना आसान हो गया है। भाषा निरंतर फैल रही है, क्योंकि इंटरनेट पर एम.पी.थ्री से हम भाषा सुन सकते हैं। सैकड़ों वेबसाइट्स हैं हिन्दी की। आज कम्प्यूटर जितनी मदद कर रहा है, कक्षाएं नहीं कर पातीं।

    —लोग तौ कहि रए ऐं कै हिन्दी मर रई ऐ!

    —नहीं चचा नहीं! यूनिकोड समर्थन के बाद इंटरनेट पर हिन्दी के औपचारिक अनौपचारिक शिक्षण का भाग्योदय हो रहा है। हिन्दी के हाथों में सौ सौ चूड़ियां हैं। रोने के दूसरे कारण हो सकते हैं, पर वह कभी विधवा नहीं होगी।

     

     

    wonderful comments!