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  • हिन्दी के आधुनिक वायसराय
  • हिन्दी के आधुनिक वायसराय

     

     

    —चौं रे चम्पू! आंख बंद ऐं तेरी, आकास मांऊं तकत भयौ का सोच रह्यौ ऐ रे?

    —हिन्दी के भविष्य के बारे में सोच रहा हूं।

    —हिन्दी कौ भविस्य तौ भड़िया ऐ, चकाचक फैल रई ऐ, दिन-दूनी रात चौगुनी, परेसानी का ऐ?

    —मुझे नहीं है, हिन्दी के वायसरायों को है।

    —हिन्दी के वायसराय कौन ऐं रे?

    —जो अंग्रेजी से इश्क करते हैं, सरेआम इस बात को कुबूल करते हैं, हिन्दी भी अच्छी जानते हैं, धंधा भी हिन्दी के कारण चल रहा है जिनका, लेकिन अंग्रेजी को भारत की मातृभाषा बनाने पर आमादा हैं। एक  कॉलेज के सेमीनार में तो हद ही हो गई चचा। सभागार ने उनके अंग्रेजी प्रेम पर उन्हें दस बार हूट किया, पर वायसराय की हेकड़ी कम न हुई। हिन्दी विरोध के लिए  बड़ी ही महीन कताई करके आए थे। हिन्दी का वरिष्ठ व्यक्ति जानकर उन्हें बुलाया गया होगा, पर उन्होंने तो प्रारंभ में ही कह दिया कि वे भारत की सभी भाषाओं में से एक भाषा के रूप में ही हिन्दी के बारे में सोचते हैं। यानी राष्ट्र भाषा, सम्पर्क भाषा, राजभाषा के रूप में नहीं। ये अंग्रेजों से सीखी गई ऐसी नीति है जो भारत में बड़ी कारगर रही। सशक्त और समर्थ का महत्व समाप्त करने के लिए, दूसरों को उपेक्षित और वंचित बताकर, उन्हें आमने-सामने खड़ा करके लड़ा दो। हम सारी भाषाओं को प्यार करते हैं, लेकिन  देश की सारी भाषाएं सबके लिए तो सम्पर्क भाषा नहीं बन सकतीं न चचा। हिन्दी है सम्पर्क भाषा और लगातार अपना विस्तार कर रही है, पर वायसरायों की बारीक मार सह रही है। आज रायशुमारी करा लो। हिन्दी परस्पर राय की भाषा है, हिन्दी गांव-सराय की भाषा है, पर वायसराय उसे अनदेखा करेंगे। हिन्दी अखबारों के पाठकों में संख्या की वृद्धि, फिल्मों, धारावाहिकों से वैश्विक होती हिन्दी उन्हें दिखाई न देगी। माना कि अंग्रेजी आज कोई विदेशी भाषा नहीं है, वह भी संविधानसम्मत एक भारतीय भाषा है, वह भी पनप रही है, वैश्विक मंच पर हमें समर्थ बना रही है, लेकिन हिन्दी के वायसराय तो उसे मातृभाषा बनाना चाहते हैं। अंग्रेजी से अपना विरोध नहीं है, लेकिन हिन्दी को हीन बता कर उसकी तौहीन भी तो न हो।

    —जे वायसराय बारम्बार तेरी बातन में कहां ते आ जाय, जे बात समझा नैंक।

    —चचा हिन्दी के एक वायसराय हैं। माइक पर बोलने गए तो हाथ में गांधी जी की एक किताब थी। आजकल भड़काऊ बोलने का बड़ा फैशन है। किताब दिखाते हुए बोले— ‘यह एक बहुत ही नासमझ और दूरदृष्टिहीन व्यक्ति की किताब है, जो आज के भारत में सचमुच लगभग मूर्ख सिद्ध हो चुका है और हो रहा है। यह राष्ट्र-भाषा हिन्दी पर महात्मा गांधी के विचार हैं, मोहन दास करम चन्द गांधी! गांधी जी के लिए ऐसे अपशब्द सुनकर सभागार में दो-तीन लोग विरोध-प्रदर्शन के लिए खड़े हुए, लेकिन महोदय ने कहा कि मैं जो कह रहा हूं, सोच समझ कर कह रहा हूं। गांधी जी ने कहा था कि वायसराय आशा करते हैं कि अंग्रेजी भाषा दिन-प्रतिदिन इस देश में फैलेगी, परिवारों में प्रवेश करेगी और अंत में राष्ट्र-भाषा के ऊंचे पद पर पहुंचेगी।’ सब जानते हैं कि गांधी जी हिन्दी के पक्षधर थे। वायसराय पर व्यंग्य कर रहे थे, लेकिन महोदय ने राजाराम मोहन राय की भविष्यवाणी दोहराई कि भारत एक दिन अंग्रेजी भाषाभाषी देश बन जाएगा। महोदय बोले राजाराम मोहन राय की भविष्यवाणी सही सिद्ध हुई, वे ज्यादा बुद्धिशाली साबित हुए, महात्मा गांधी बुद्धिहीन साबित हो रहे हैं, आज के भारत में। महोदय को हिन्दी का भविष्य पथ उज्ज्वल नहीं दिखाई दे रहा था। वे चाहते हैं कि भारत में कक्षा एक से अंग्रेजी को अनिवार्य कर देना चाहिए, क्योंकि हिन्दी की मांग कहीं नहीं है। उन्होंने सभागार से सवाल किया कि कहीं किसी गांव, कस्बे, शहर से हिन्दी की मांग आती है? बोलिए! चचा बेकली छा गई। कोई उनसे सहमत नहीं था। महोदय का बेइंतेहा अंग्रेजी-प्रेम किसी को रास नहीं आया। एक छात्र वायसराय महोदय से बोला कि फिर आप हिन्दी अख़बार के सम्पादक क्यों थे? हिन्दी की एक चैनल के चीफ़ क्यों हैं? मैकाले तो मर गए, मर्डोक से कहें कि अपनी सारी हिन्दी चैनलों को अंग्रेजी कर दे। हिन्दी का तो कोई भविष्य है ही नहीं।

    —ऐसे लोगन कूं वायसराय मती बोल!

    —फिर क्या बोलूं?

    —वायसराय नायं, हिन्दी में लगे भए वायरस।

     

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