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    —चौं रे चम्पू! बगीची पे चौं नाय आयौ?

    —चचा, कल रात से बेहद दुखी हूं। दो-तीन दिन से निरंतर यात्राओं में था। थकान का कम्बल ओढ़ने के बावजूद नींद नहीं आई।

    —का भयौ?

    —दूसरों को शिक्षा देने वाला कभी-कभी अशिक्षितों जैसा व्यवहार कर बैठता है। आप तो जानते हैं मैं आने अधिकांश कार्य लैपटॉप, आईपैड, आईफोन पर करता हूं। कागज़, कलम का इस्तेमाल करता तो हूं, लेकिन पहले की तुलना में केवल दस प्रतिशत। यात्राओं के लिए मेरे पास दो लैपटॉप हैं, एक विंडोज का एक एप्पल का। वे चकाचक भरे रहते हैं तो अतिरिक्त हार्ड ड्राइव रखता हूं ताकि मनोवांछित फाइल निकाल सकूं। इक्कीस फरवरी को इन्दौर में कार्यक्रम था और मैं अपने लैपटॉप के साथ दो टी.बी. क्षमता वाली वह हार्ड ड्राइव ले गया, जिसमें मेरे ऐसे कार्य का भंडारण था, जिसका बैकअप मैंने दो साल से नहीं लिया था। दिल बैठा हुआ था तो आपके पास बैठने कैसे आता।

    —ढंग तै बता तो कोई सलाह दै सकें।

    —सिलसिलेवार सुनिए। बाइस फरवरी को पुस्तक मेले में दोपहर डेढ़ से ढाई तक लेखक मंच पर मेरा एकल काव्य पाठ होना था, वैसे तो इतनी कविताएं याद हैं कि दो-तीन घंटे ऐसे ही सुना सकता हूं, पर मैंने सोचा कि अपने खजाने से कुछ ऐसी कविताएं निकालता हूं जो कभी सुनाईं नहीं। मैंने एक लैपटॉप के साथ वह हार्द ड्राइव भी रख ली। चला गया इन्दौर। आप तो जानते हैं कि प्रेमीजन और पत्रकार ऐसा घेर लेते हैं कि काम करने का मौका मुश्किल से मिल पाता है। इन्दौर में कोई काम नहीं हुआ। बाइस को हवाई अड्डे से सीधे पुस्तक मेला गया। वहां भी सोचा कि समय से पहले पहुंच गया हूं तो चलो कम्प्यूटर हार्ड ड्राइव लेकर प्रगति मैदान के नवाचार कक्ष में बैठकर थोड़ा काम कर लूं, फिर खुद से कहा क्या है चम्पू पैंसठवें वर्ष में प्रवेश कर रहे हो और परीक्षा से पहले छात्रों जैसे हालत हो रही है तुम्हारी। जो मन आए सुना देना। अभी तो यही कामना रखो कि मंच पर सुनाते-सुनाते सो न जाओ।

    —आगरा ऊ तौ जाना औ तोय ताज महोत्सव में।

    —हां चचा, एयरपोर्ट पर घर से कार मंगा ली थी, सामान उसी में रखा था। अपने मित्र विजयदेव शर्मा के साथ एकल काव्य पाठ के बाद आगरा निकल गया। आगरा में भी शानदार काम दिखाया। आगरा से लौटकर तेईस को अपने काम-धंधों में लग गए। कल जब आगरा-इन्दौर घूमकर आई हुई अटैची और बैग का सामान खाली करने लगा तब भी ध्यान नहीं आया कि कोई चीज कम है। चार-पांच दिन की लम्बी थकान के बावजूद काम करने बैठा तो हार्ड ड्राइव की आवश्यकता महसूस हुई तो पाया कि वह तो है ही नहीं। चचा, चार घंटे परेशान रहा, हर तरह से दिमाग दौड़ाया, कहां रह सकती है, कहां खो सकती है, कैसे बिछुड़ गई।

    —पिछले साल दीमग खाय गईं तेरौ सामान। अब तेरी मशीन ने कौन खाय गयौ?

    —चचा, इन्दौर से दिल्ली लौटने तक की स्मृति की रील पूरी घुमाई। एक जगह आकर रील रोकी। दुबारा देखी। हुआ क्या था कि इन्दौर के कविसम्मेलन में मैं अपना पूरा बैग लादकर नहीं ले गया। काम की दो-तीन चीजें एक छोटे से काले पाउच में रखीं और आ गया। वहां जाकर ध्यान आया कि मैं अपनी सायंकालीन एक जरूरी औषधि भूल आया हूं। कार्यक्रम स्थल से होटल की दूरी चालीस मिनट की। आने-जाने में देढ़ घंटा लगेगा। माना कि इस अवधि में मेरी बारी नहीं आएगी, लेकिन मंच से इतनी देर गायब रहना भी शोभा नहीं देगा। मेरे मामा जी मेरे प्यार में खिंचे चले आए थे। श्रोताओं की दूसरी पंक्ति में बैठे थे। मामा जी को मैंने साधिकार नेपथ्य में बुलाया, कमरे की इलैक्ट्रोनिक चाबी दी, दवाई बैग में कहां मिलेगी, बताया और भेज दिया। वे लगभग एक घंटे में लौट आए। दवा पाकर मैं खुश, देकर वे खुश। अगले दिन होटल छोड़ते समय जब मैंने देखा कि उस बैग का बक्कल टूटा हुआ नीचे पड़ा है और उसका एक लोहे का हुट्का भी टूटा हुआ है तो मामा के प्रति मामात्व भाव जागा। बेचारे रात में खोल नहीं पाए होंगे, जोर लगाया होगा तो बक्कल टूट गया होगा। दवाई लाकर मामात्व तो दिखाया उन्होंने। अब स्मृति की रील ने सम्भावना का एक शॉट दिखाया। हो सकता है मामा जी ने जोर आजमाइश के दौरान बैग उल्टा-पुल्टा किया होगा, उस प्रक्रिया में हार्ड ड्राइव होटल के कमरे में नीचे कहीं सरक गई होगी। स्मृति की फिल्म रोकर कर मैंने मामा जी को फोन मिलाया और जब उनसे पता चला कि उन्होंने तो बडे प्यार से बैग खोला था, हार्ड ड्राइव का पाउच भी देखा था, बन्द करके चले आए। ओह, इसका मतलब उनके आने के बाद, मेरे द्वारा होटल मे जाने के बीच किसी ने हार्ड ड्राइव चुरा ली। चुराने को तो लैपटॉप भी ले जा सकता था, लेकिन हार्ड ड्राइव के पाउच में उसने सोचा होगा कि हार्ड कैश होगा। चचा, थोड़ा चाचात्व दिखाओ और बताओ क्या करूं?

    —अच्छे होटलन में सीसीटीवी लगे हौवैं। होटल वारैन ते बात कर। उम्मीद ऐ मिल जायगी। मिल जाय तो बगीची पे लड्डू बांट दियौ।

     

    wonderful comments!