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  • हम भी भरे तुम भी भरे
  • हम भी भरे तुम भी भरे

     

     

    —चौं रे चम्पू! बहुत व्यस्त है गयौ ऐ का? दिखाई नायं दियौ कई दिनान ते।

    —व्यस्त कौन नहीं है चचा! खाली कोई नहीं बैठा! हसरत साहब का शेर है ‘तुम्हें ग़ैरों से कब फ़ुर्सत, हम अपने ग़म से कब ख़ाली, चलो बस हो चुका मिलना, न हम ख़ाली न तुम ख़ाली।’ आपके लिए लेकिन मेरे पास दूसरा शेर है, जो मिर्ज़ा ग़ालिब ने कहा है— ‘मेहरबां हो के बुला लो मुझे चाहे जिस वक्त, मैं गया वक्त नहीं हूं कि फिर आ भी न सकूं।’ जिन से मन मिला हो उनसे मिलने में व्यस्तता आड़े नहीं आती।

    —तौ कल्ल चौं नायं आयौ?

    —कल मिलन के एक दूसरे महोत्सव में गया था चचा। इतने लोग मिले, बरसों बाद, लगा जैसे गया वक्त लौट आया हो। आगरा विश्वविद्यालय की एल्यूमनाई एसोसिएशन का कार्यक्रम था।

    —जे एलूमनाई का ऐ रे?

    —किसी स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय में पढ़े छात्र को एल्यूमनस कहते हैं। लातीनी शब्द है। उसी से बने एल्यूमनाई संघ। ऐसा पहला संघ अमरीका में कोलम्बिया कॉलेज का बना था, अठारह सौ तिहत्तर में। बिछुड़े यारों ने मिलन के मौके निकाले। अभी तक भी यह एसोसिएशन सक्रिय है। जब मैं आगरा विश्वविद्यालय का छात्र था चचा, तब यह भारत का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय था। अब तो उसके कितने ही टुकड़े हो गए। नाम भी बदल गया।

    —भीम राव अंबेडकर विश्वविद्यालय?

    —हां चचा! लेकिन एसोसिएशन का नाम आगरा विश्वविद्यालय के नाम पर ही रखा गया है। ये एसोसिएशन बहुत पहले बनाई जानी चाहिए थी, पर भला हो हरिवंश चतुर्वेदी, देव स्वरूप और अतुल जैन का कि संगठन बनाया और उसका पहला शानदार जलसा किया। विश्वविद्यालय के भूतपूर्व कुलपति जी. सी. सक्सेना, पत्रकार शशि शेखर, नेता-अभिनेता राज बब्बर और एन.डी.टी.वी. के पंकज पचौरी ने  इस शानदार पहल को प्रोत्साहन दिया। मुझे जो आनन्द आया बता नहीं सकता चचा।

    —चौं नाय बता सकै?

    —तीस-चालीस साल पहले बिछुड़े सहपाठियों से मुलाकात हुई। गए वक्त की स्मृतियां नई हो उठीं। न जाने मस्तक के किस प्रकोष्ठ से अतीत की फिल्में दिखने लगीं। अपने कॉलेज की मुंडेर, कैंटीन, गलियारे और यार सारे के सारे, प्रकट हो गए। दोस्तों से मिल कर ऐसी हूक उठी कि आनंदातिरेक में आंखें छलछला आईं। यारों के वर्तमान चेहरे धुंधले दिखने लगे। दिपदिपा रही थीं जवानी की यादें। चचा, सच मानना घनघोर ठण्ड में भी पसीने आ रहे थे। मित्रों से कंठ लगते ही कंठ अवरुद्ध हो रहा था। ज्यादा दिन बाद मिलो तो मिलन में भी विरह की सी टीस उठती है। एक से मिल रहा था तभी दूसरे ने पीछे से कंधे पर हाथ रखकर जमाल का दोहा सुना दिया— ‘अलक लगी हैं पलक से, पलक लगी भौं नाल। चंदन-चौकी बिछा दे, कब के खड़े जमाल।’ समझ में नहीं आ रहा था कि कितनी चंदन-चौकी बिछाऊं। आजकल के युवा अपने सहपाठियों से मेरी-आपकी तुलना में ज्यादा जुड़े रहते हैं।

    —सो कैसे?

    —मेहरबानी इंटरनेट की। कुछ इंटरनेट जालघर हैं जो मित्र-मिलन के मंच बने हुए हैं। जैसे, भारत स्टूडेंट्स, क्लास मेट्स, बैच मेट्स। इनके अलावा फेस बुक, ऑर्कुट और ट्विटर पर सहपाठियों के समुदाय बने हुए हैं। कैम्पस से बाहर किसी ठेले पर खड़े होकर चाट भले ही न खा सकते हों पर चैट तो कर ही सकते हैं। सबसे बड़ी खूबी इन परिषदों और समुदायों की ये है कि इनका आधार जाति, गोत्र, रंग, वर्ण और धर्म नहीं है। आधार है मनुष्यता और मैत्री। न हम खाली, न तुम खाली वाले इस जमाने में पुराना यार थोड़ी देर को भी मिल जाए तो लगता है तुम भी भरे हम भी भरे।

    —जय जगदीश हरे! कित्ते लोग आए कार्यक्रम में?

    —हाल पूरा भरा था चचा। भोजन की जगह छोटी पड़ गई, पर यार मिले तो एक भूख तो मिटी।

    —कौन सी भूख?

    —हूक की भूख।

     

     

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