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  • साठ हुए गणतंत्र के ठाठ
  • साठ हुए गणतंत्र के ठाठ

     

     

    —चौं रे चम्पू! कल्ल कोहरा में लिपटी भई गनतंत्र दिबस की परेड देखी। साठ साल कौ है गयौ गनतंत्र। बेसन में चार तरियां की दार मिलाय कै चीला बनाए ऐं, खायगौ?

    —क्यों नहीं चचा, ज़रूर खाऊंगा! और मैं साठवें में लग जाऊंगा आठ फरवरी को। अपने गणतंत्र से ठीक एक साल तेरह दिन छोटा हूं। छब्बीस का अंक आठ बनता है और मेरा तो आठ है ही। दोनों में आठ का ठाठ है।  इसलिए मेरी और मेरे गणतंत्र की हालत एक-सी है। अच्छी समझो तो अच्छी, खस्ता समझो तो खस्ता।  आप जैसे उदारमना नागरिक के चीले खा-खा कर लचीले हो गए हैं।

    —लचीले कैसे भए?

    —तने रहने के बावजूद, कहीं भी झुक जाते हैं, मुड़ जाते हैं, पर टूटते नहीं हैं। लचीले हैं इसलिए आसानी से लड़ते नहीं हैं। जो कड़क होते हैं, तड़क-भड़क में रहते हैं वे चटाक से टूट जाते हैं। हम ऐसे क्यों हैं इसकी तारीफ़ करें तो धन्यवाद और अगर इसके लिए दोष देना हो तो देना गौतम-गांधी को।

    —और बता!

    —दूसरी बात ये है चचा कि हम घुलनशील हैं। घुलनशील हैं तभी तो आपस में भी घुलते-मिलते हैं और अंदर-अंदर घुलते भी रहते हैं। अंदर-अंदर घुलते रहने से घुटन बढ़ जाती है कई बार। तीसरी बात ये है चचा कि हम प्रक्षेपक नहीं हैं क्षेपक हैं। क्षेपक रहता है पीछे, विशिष्ट परिशिष्ट की तरह्। परमाणु बम हमने तो नहीं बनाएं, बनाए अमेरिका, रूस, चीन ने। पीछे-पीछे हमने भी बना दिए। जो पीछे होता है वह आगे वाले को पकड़ कर रखता है। हम उन्हें थामे हुए हैं। भैया, छोड़ मत देना। हमारे पास भी है। हालत ऐसी हो जाएगी तुम्हारी जैसे दिवाली के मौके पर कुत्ते की हो जाती है पूंछ में पटाखा बांधने से। पीछे रहकर ही आगे वाले को संभाला जा सकता है। हमारा गणतंत्र मजबूत है। हम शांति को बरकरार रखना चाहते हैं।

    —चौथी बात बता।

    —चौथी ख़ूबी या ख़ामी है हमारी कि हम बड़े अनुकूलित हैं। अनुकूल हो जाते हैं अनुकूल कर लेते हैं। कई बार अनुकूलन में कूलन ख़त्म हो जाता है। मान लो चचा, कोई चीनी हिंदुस्तान आए और किसी पंजाबी ढाबे पर बैठकर चाइनीज़ नूडल्स मंगाए तो अल्ला कसम वह हल्ला मचाता हुआ रेस्टोरेंट से बाहर निकल जाएगा। उसकी आंख नाक कान और नितम्ब-तल से धुआं निकलेगा। झेल नहीं पाएगा। इतनी मिर्ची डाल देते हैं। कोई अमरीकी पॉप म्युजिक अगर पंजाब में जाकर सुने तो अपने सारे पाप भूलकर भांगड़ा करता हुआ निकलेगा। पांचवीं, हमारी संस्कृति जो लोगों को आकर्षित करती है, चचा। ढोल-नगाड़े, उत्सव। किसी भी मुल्क में शादी पन्द्रह दिन का उत्सव नहीं होती। संस्कृति में ही समाहित है हमारे देश की आस्था और आध्यात्म। इतना भरोसा करते हैं भगवान पर कि भगवान का स्वयं से भी भरोसा उठ गया होगा कि मैं हूं भी कि नहीं।

    —तू दूसरौ चीला ऊ खायगौ?

    —तुम खिलाते जाओ और मेरी बात सुनते जाओ, मुझे क्या परेशानी है चचा? पानी दे दो फिर चाय भी पिला देना। सातवीं ख़ूबी है, चाय-पानी। चपरासी से लेकर और सचिव तक चाय-पानी की चाहत रहती है। यहाँ गणतंत्र चाय-पानी के सहारे चल रहा है। अरब देश, ईरान-इराक पैट्रोल से चल रहे हैं। अमेरिका उनका पैट्रोल छीन के काम चला रहा है। चीन मजदूरों के पसीने से चला रहा है। पर हम अपने गणतंत्र को चाय-पानी से चला रहे हैं। आठ के ठाठ में आठवीं  है हमारी डेमोक्रेसी है। जिसमें ऐसी-तैसी भी होती रहती है और ऐसी-ऐसी उपलब्धियां भी होती रहती हैं जो किसी और के पास नहीं हैं। हम देशभक्त हों या न हों देशभक्ति के गीत गाना जानते हैं। तो चचा, छब्बीस बीत गई आ गई सत्ताईस। लेकिन गणतंत्र को सत्ता के ईश नहीं चला रहे हैं।

    —फिर कौन चलाय रए ऐं रे?

    —सत्ताईस का योग होता है नौ। यह अंक सारे अंकों में सबसे ताकतवर माना जाता है। गणतंत्र को नौकरशाह चला रहे हैं। नौ का अंक देखा है, चचा! झुका हुआ इंसान होता है नौ का अंक। जो दूसरों को झुका कर रखता है और सत्ता के ईश के सामने झुककर रहता है। कैसी कही?

     

    wonderful comments!