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  • सच का सामना
  • सच का सामना

     

     

    —चौं रे चम्‍पू! तू कित्तौ सत्यबादी ऐ रे?

    —बहुतों से ज़्यादा सत्यवादी हूं। खरी और सही बात कहने में भरोसा रखता हूं, लेकिन अप्रिय सत्यों से बचने की कोशिश भी करता हूं। ‘सत्यंब्रूयात प्रियंब्रूयात नब्रूयातसत्यमप्रियम’ को मानता हूं। अप्रिय मामले हों तो कई बार सच बोल कर भाग लेता हूं, कभी तो सच से ही भाग लेता हूं।

    —यानी, तू सच कौ सामनौ नायं कर सकै?

    —सच का सामना करने की ताक़त मनुष्यों में नहीं होती चचा। पशुओं में मनुष्यों से ज़्यादा होती है। मनुष्य ने अपने लिए नीति-अनीति के इतने ताने-बाने बना लिए हैं कि उनसे निकल कर हंड्रैड परसेंट सत्यवादी बने रहना नामुमकिन है। इन दिनों टीवी पर एक रिएलिटी शो आ रहा है, नाम ही उसका ‘सच का सामना’ है। हॉट सीट पर किसी नामीगिरामी को स्पर्धी बनाकर बिठाया जाता है फिर उससे अंतरंग और गोपनीय सवाल पूछे जाते हैं, सच बोले तो पैसा मिलता है। कुर्सी मनभेदी है। झूठ पकड़ लेती है। झूठ बोलते समय शरीर में जो भौतिक रासायनिक परिवर्तन आते हैं उनका पौलीग्राफ बना देती है। बंदा सवालों के जवाब में धकाधक सच बोलता जाए तो एक करोड़ तक जीत सकता है।

    —कैसे सवाल?

    —जैसे— क्या आपके अपनी भाभी से शारीरिक संबंध थे? क्या आपने अपने पति के अतिरिक्त किसी से शारीरिक संबंध बनाए? क्या आपने अपने दोस्त के साथ विश्वासघात किया? काम्बली से पूछा था कि क्या आपके प्रिय दोस्त सचिन ने आपको कभी धोखा दिया? और सत्यवादी बनने का पैसा देने वाली सीट पर बैठ कर उसने बता दिया कि हां दिया था। कहते हैं कि कार्यक्रम देख कर सचिन एकांत में रोए। किसी से पूछा कि क्या कभी वेश्या के पास गए? फिर पूछा कि क्या आपने अपनी बेटी की उम्र से कम  उम्र की कन्या से संबंध बनाए? हॉट-सीटित ने कह दिया कि बनाए। दर्शकों को जवाब पर मज़ा आया और साथ में गालियां भी दीं— कम्बख्त! वहशी! हवस के कीड़े! कुछ लोग ऐसे सवालों को टाल गए, या झूठ बोला तो पौलीग्राफिक मशीन को अपने माफिक नहीं लगे। शो चाहता है कि समाज-सेवा बताओ तो मसाज-मेवा भी बताओ। समाज-सेवा जानने में किसकी दिलचस्पी है, मसाज-मेवा बताओ और एक करोड़ की मलाई खाओ। फ्रायड की जय बोलो और अपने फ्रॉड खोलो। चचा देह का नाता तो कुदरत ने सारे प्राणियों के लिए एक सा बनाया है। देह के नाते में नेह का नाता भी हो तो जीवन भर सुखों का मेह बरसता है। नेह से भटके तो रेगिस्तान की रेह मलते रहो देह पर। न घर न बेघर।

    —बेपर की मत उड़ा। तू बैठैगौ वा सीट पै?

    —कभी नहीं! परमेश्वर सत्य हो सकता है, पर मैं मनुष्य के सत्य को परमेश्वर नहीं मानता। चचा, हर सामाजिक प्राणी के पास दो तरह के सच होते हैं। अपने लिए गोपन सच और समाज के लिए ओपन सच। भारत में समाज अभी इतना ओपन नहीं हुआ है कि अपने हर प्रकार के वीभत्स और जुगुप्सा पैदा करने वाले गोपन को सामने ले आए। सत्य का बीज फूटने के बाद दोनों तरफ बढ़ता है। धरती में जाता है जड़ बनकर और ऊपर आता है तने की तरह तनकर। कहते हैं जड़ मत खोदो, पेड़ गिर जाएगा। जड़ बदसूरत होती हैं चचा पर पेड़ उन्हीं से सुन्दर और हराभरा होता है।

    —तौ जे जड़मति ऐसे कार्यक्रम दिखामें ई चौं ऐं?

    —सास-बहू और बालिकावधू में लोगों को मज़ा नहीं आ रहा। कथा में बैठे लोगों से कोई आकर कहे कि इधर पड़ौसी के घर में झांक कर देखो क्या चल रहा है तो आधे से ज़्यादा लोग बिना परसाद लिए बेटिकिट तमाशा देखेंगे। चेहरे पर आंखें चौड़ गईं तो बाकी लोग भी उठ आएंगे। भूख और ग़रीबी का सच नहीं दिखाते रिएलिटी शो में। दिमागी ग़रीबी और शारीरिक भूख दिखाते हैं।

    —दिखाऔ न दिखाऔ, सच तौ सच ऐ! सच कौ कोई विकल्प नाऐं।

    —जिस सच का कोई विकल्प नहीं, वो कहां रहता है चचा? फिल्मी गानों में बड़ी सचाई से बताया गया कि जितने भी सइयां थे वे ‘झूठों के बड़े सरताज निकले’। अच्छी तरह मालूम है कि ‘झूठ बोले सइयां हमार’, फिर भी उसी पर उमड़ता है प्यार। यहां तक कि ‘मनमोहना बड़े झूठे’! प्यारे का झूठ प्यारा होता है। झूठ मनुष्यता की पहचान है, सत्य देवताओं की। कितने देवता हैं इस धरती पर? और जो हैं, क्या उन्होंने कभी झूठ नहीं बोला? बोलो? तुम बैठोगे उस गर्म कुर्सी पर?

    —एक करोड़ में बगीची में बहार आय जायगी। सब बताय दिंगे। हमारौ का ऐ?

    —तुम्हें कोई बुलाय तब न!

     

     

     

     

    wonderful comments!