Homepage>
  • chaure champu
  • >
  • मस्त रफ़्तार संगीत की सुर-बहार
  • मस्त रफ़्तार संगीत की सुर-बहार

    —चौं रे चम्पू! अब कैसी तबियत ऐ रे?

    —अरे चचा! आज तुम्हें ख़ुद आना पड़ गया!

    —तौ का है गयौ? हमेसा तू ई बगीची पै आयौ करै, आज हम हस्पताल आय गए। मुखड़ा तौ चमक रह्यौ ऐ तेरौ!

    —चमक रहा है, यहां से निकलने की ख़ुशी में! हालांकि, अपोलो के इस कमरे से नजारा बड़ा अच्छा दिखाई दे रहा है। मैट्रो स्टेशन सामने है। यात्री फुट ब्रिज पर आते-जाते दिखाई दे रहे हैं। शानदार सा ज्यामितिक पार्क दिखता है। लोग यहां सुबह टहलते हैं। सायंकालीन युवा क्रीड़ाएं देखकर दिल बहलते हैं। अन्दर इस कराहों के जंगल में दिल दहलते हैं। बस अब यहां से डिस्चार्ज होने वाला हूं।

    —तू अपनी पूरी बात बता! का भयौ, कैसे भयौ?

    —चचा, पूरी सुननी है तो कहानी शुरू होगी ऑस्ट्रेलिया से। मैंने पिछले साल बेटे के साथ ब्रिस्बेन में शाम को सडकों पर घूमते वक्त साइकिलों की एक लंबी कतार देखी। पुत्र ने बताया कि ये किराए पर मिलती हैं। मैंने पूछा कि क्या हमें मिल सकती है? उसने कहा क्यों नहीं? उसने अपना क्रेडिट कार्ड इस्तेमाल किया और दो साइकिलें ले लीं। पीली साइकिल, पीले हैलमेट। पैंतीस-चालीस साल बाद साइकिल को हाथ लगाया था। पहले दस-बीस मीटर तक तो डगमगाई, पर तैरना और साइकिल चलाना कोई भूलता है क्या ज़िन्दगी में? पांच मिनिट के अन्दर मुख्य सड़क पर चलाने का आत्मविश्वास आ गया।

    —कित्ती देर चलाई?

    —घंटे भर से ज़्यादा चलाई। पन्द्रह किलोमीटर का चक्कर तो लग ही गया होगा। बड़ा आनन्द आया। शाम को नदी के किनारे बैठ कर चुस्की लगाई, भोजन किया तो और भी आनंद आया। दिल्ली लौटकर मैंने पहला नहीं तो दूसरा काम ये किया कि युसूफ सराय से एक स्पोर्ट्स साइकिल ख़रीदी। साथ में पूरा तामझाम, हैलमेट, बत्ती, घंटी, टूल बॉक्स, पम्प, ग्लब्ज़, गॉगल्ज़। फुलटुस आनंद आने लगा। कभी जसोला स्पोर्ट्स कॉम्पलैक्स का राउंड लगा लिया, कभी अपने एफ पॉकेट की परिक्रमा कर ली। एक बार नौएडा का पच्चीस किलोमीटर का चक्कर लगाते हुए विश्वसनीय आत्मबोध हुआ कि चार पहिए के वाहनों में साइकिल सवार और पदयात्रियों के लिए कोई सम्मान नहीं है।

    —तौ तेरी साइकिल कौ असम्मान कौन्नै कियौ?

    —बीते शुक्रवार को जसोला स्पोर्ट्स कॉम्पलैक्स जा रहा था। तेज और मस्त रफ़्तार, कान में संगीत की सुर-बहार। अचानक अंधे मोड पर, सामने की विपरीत दिशा से आई एक कार। मैंने कसकर ब्रेक मारे। कार से आमने-सामने की टक्कर तो नहीं हुई, लेकिन मैं सीधे हवा में उछल कर, उसके बोनट से टकराता हुआ हथेलियों और घुटनों के बल नीचे गिरा। हेलमेट ने तुम्हारे चम्पू को बचा लिया। अपराधी कार चालक थोड़ा सहमा हुआ था, लेकिन जब मैं उठकर खड़ा हो गया तो उसने रुकने की जहमत न उठाई। मैं जब तक अपना चश्मा उठाऊँ और उसके नंबर पढ़ने की कोशिश करूं, वो तो ये जा, वो जा। गर्म चोट तत्काल पता नहीं चलती है। मैंने साइकिल उठाई, चलाई। पीड़ा के बावजूद दो-तीन सौ मीटर तक घर की ओर चलाकर ले गया। जब लगा कि अब चलाना कठिन है तो फ़ुटपाथ पर बैठ गया। फोन करके बिटिया को बुलाया। अनुमान नहीं था कि बांए घुटने की पटेला बोन टूट गई होगी, दो घंटे के बाद तुम्हारी सर्जरी हो जाएगी। अप्रेल तो अप्रेल, मई के भी सारे कार्यक्रम निरस्त करने होंगे।

    —फिर का भयौ?

    —जिस वक़्त मैं बिटिया का इंतेज़ार कर रहा था, कूड़ा बीनने वाले तीन बच्चे मेरी साइकिल से आकृष्ट हुए। बिना मेरी आज्ञा लिए प्रयोग करने लगे। एक ने घंटी बजाकर देखी, दूसरे ने लाइट जलाई। तीसरा बोला, अबे ये तो गीयर वाली है। तीनों ने अपने-अपने कूड़े के थैले नीचे रख दिए। मैं दर्द को मूर्ख बनाने के लिए बेकार ही मुस्कुरा रहा था। मुस्कान देखकर तीनों और उत्साहित हुए। पहले ने अपनी पारखी कबाड़ी नज़रों से मेरे हेलमेट पर यह देखने के लिए उंगली मारी कि प्लास्टिक का है या स्टील का। दूसरे ने आवाज़ सुनकर कहा, सौलिड है बे।

    —मेरौ चम्पू तौ सुपर सौलिड हैई!

    wonderful comments!

    Comments are closed.