Homepage>
  • अवतरण
  • >
  • बीस से तीस की टीस
  • बीस से तीस की टीस

     

     

    —चौं रे चम्पू! बोलै चौं नायं, का उधेड़बुन में ऐ?

     

    —क्या बताऊं चचा, पिछले पचास साल से भाषाई कुंठाओं में जी रहा हूं। खुर्जा में हाईस्कूल किया था, हाथरस में इंटर। उस समय मेरी अंग्रेज़ी बहुत अच्छी थी। अच्छी इस आधार पर कह रहा हूं कि सर्वाधिक नंबर आते थे। पर खुर्जा-हाथरस में अंग्रेज़ी बोलता कौन था उन दिनों।

     

    —आज ऊ नायं बोलें!

     

    —अंग्रेज़ी के अध्यापक भी अंग्रेज़ी नहीं बोलते थे। वे हिंदी माध्यम से ही अंग्रेज़ी पढ़ाते थे। उनका अंग्रेज़ी उच्चारण ऐसा था कि किसी अंग्रेज़ की समझ में भी बहुत मुश्किल से ही आ सकता था। इंटर यानी बारहवीं की पढ़ाई पूरी होने वाली थी तभी रेडियो पर सुनने में आया कि दक्षिण भारत में हिंदी के विरुद्ध आंदोलन हो रहे है। हिन्दी के साइनबोर्ड तारकोल से पोते जा रहे हैं। हिंसा की घटनाएं हो रही हैं। मन बड़ा क्षुब्ध हुआ। पत्र के रूप में एक लंबी कविता लिखी, ’दक्षिण भारतीय मित्र के नाम पाती’। बात भावनाओं से भरी हो तो उसे पत्र नहीं पाती कहा जाता था। कविता तो कहीं खो-खा गई पर उसमें पिरोए गए मुद्दे कुछ इस प्रकार थे। हम भारतवासी हैं इसलिए हमें गांधी जी की बातों को मानना चाहिए कि हिंदी हमारी राष्ट्र भाषा है। हम सबको जोड़ती है। यह प्रेम की भाषा है। ‘तुम्हारे मन में भी अगर प्रेम हो तो…. हिंदी पर कालिख मत पोतो! हटानी ही है तो देश से अंग्रेज़ी हटाओ। हिंदी से प्रेम मत घटाओ।’ कुछ इसी तरह के भाव थे। कविता कुछ ज़्यादा खिंच गई थी, मेरे सहपाठियों की समझ में नहीं आई, लेकिन उसे लिखकर मुझे अहसास हुआ कि मैं अपनी उम्र से कहीं ज़्यादा परिपक्व हूं। ये अबोध क्या जानें कि भाषा के आत्माभिमान का क्या अर्थ होता है। और चचा अब उल्टा हो रहा है।

     

    —का उल्टौ भयौ?

     

    —अब के युवाओं से बात करता हूं तो स्वयं को अबोध नज़र आता हूं। हिंदी के पक्ष में समझाता हूं तो निर्वाक हो जाता हूं।

     

    wonderful comments!