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  • पीर जब पर्वत सी हो 
  • पीर जब पर्वत सी हो 

     

     

    —चौं रे चंपू! ताज महोत्सव के बाद फिर ते आगरा चौं गयौ रे?

     

    —चचा, ताज महोत्सव को तो सप्ताह से ज़्यादा हो गया, इस बार गया था महाकवि दुष्यंत कुमार के चालीसवें पुण्यपर्वोपरांत स्मरण दिवस समारोह के लिए। वहां मेरा काव्य-पाठ नहीं था, बल्कि दुष्यंत पर बोलना था। दुष्यंत मेरे बड़े प्रिय ग़ज़लकार रहे हैं। जिन लोगों ने बुलाया, उनमें से एक मेरे बड़े पुराने परिचित मित्र कैप्टन व्यास चतुर्वेदी थे। पिछले तीन दशकों से आगरा में ‘सहयात्रा’ नामक संस्था चला रहे हैं। साहित्यिक, सांस्कृतिक और सामाजिक सरोकारों के कार्यक्रम आयोजित करते रहते हैं। सन अठहत्तर के बाद न जाने उन्होंने कितनी बार आगरा के कविसम्मेलनों में बुलाया होगा मुझे। साफ़-सुथरे मिजाज़ के कड़ियल कोमल व्यक्तित्व हैं।

     

    —कड़ियल कोमल चौं कही?

     

    —कड़ियल इसलिए कि मिलिट्री में रह चुके हैं। अनुशासनप्रिय हैं और भाषा में एक मर्यादा का सदैव ख़्याल रखते हैं। कोमल इसलिए कि स्वयं कवि हैं। दुष्यंत कुमार के प्रेमी हैं। कई वर्ष से बुला रहे थे। एक तो दुष्यंत-संदर्भ और पुराने दिनों की याद, तो कैप्टन साहब से मिलने का मन भी हुआ, मैं चला गया। एक पुराने कवि-मित्र शिवसागर मिले। पैंतीस साल पहले मैं उन्हें दिल्ली के कविसम्मेलनों में बुलाया करता था। संकोची स्वभाव के मधुर गीतकार हैं। एक गीत बहुत चलता था उनका, तन्मय होकर सुनाते थे, ‘आलिंगन को व्याकुल हैं, चारों मीनारें ताज की। दो बाहें शाहजहां की हैं, दो बहियां हैं मुमताज की।’

     

    —साहजहां की बाहें और मुम्ताज की बहियां! वा भई वा!

     

    —उनके गीतों में खड़ी बोली और ब्रजभाषा का अच्छा मिश्रण रहता है। ख़ैर, वहां जाकर इसलिए भी अच्छा लगा, क्योंकि दुष्यंत कुमार के छोटे पुत्र अपूर्व त्यागी और उनकी पत्नी दीपिका से भेंट हुई। वे एक स्कूल चलाते हैं, जिसका नाम है कर्नल्स ब्राइट लैंड स्कूल। भव्य स्कूल है। अतिविराट सभागार। अतिविराट इसलिए हो गया क्योंकि महाकवि दुष्यंत कुमार की आत्मा वहां बसती है। वहां के बच्चों, अध्यापक-अध्यापिकाओं में उनके गीत और उनकी ग़ज़लें लोकप्रिय हैं। दुष्यंत के गीतों-ग़ज़लों पर आधारित प्रतियोगिताएं कराते हैं। वर्ष में अनेक कार्यक्रम दुष्यंत कुमार के नाम पर चलते ही रहते हैं। मेरी जानकारी में इस देश में दो ही संस्थाएं हैं, जो दुष्यंत के नाम को आगे बढ़ा रही हैं। एक तो भोपाल में राजुरकर राज का दुष्यंत संग्राहलय और दूसरे ये।

     

    —व्हां कोई कबिसम्मेलन हतो का?

     

    —नहीं! मैंने बताया न कि कविसम्मेलन नहीं था। श्रोताओं में बहुत सारे कवि थे। आगरा के सबसे लोकप्रिय कवि श्री सोम ठाकुर थे। मंच पर बैठे अध्यक्ष, मुख्य अतिथि, विशेष अतिथि और संस्था के पदाधिकारी, सभी कवि थे। थोड़ा-बहुत काव्य-पाठ भी हुआ। एक सरल सा अच्छा गीत ज्योत्सना शर्मा ने सुनाया।

     

    —का सुनायौ?

     

    —आपकी दिलचस्पी कविता-गीतों में ज़्यादा है चचा! मैं ज्योत्सना की तरह गाकर तो नहीं सुना सकता, धुन याद नहीं।

     

    —अरे कैसै ऊ सुनाय तौ सई! हम तौ कहूं जामैं नायं, तू बताय देय तौ सीरक सी परि जाय, और का?

     

    —ज्योत्सना ने गाकर सुनाया था, ‘डोर जब टूटे सांसों की, तिनके का सहारा बहुत होता है। चलो तिनका बन जाएं, चलो तिनका बन जाएं। रात जब गहरी काली हो, दीये का सहारा बहुत होता है। चलो दीया बन जाएं, चलो दीया बन जाएं। धूप जब तीखी पैनी हो, छाया का सहारा बहुत होता है। चलो छाया बन जाएं, चलो छाया बन जाएं। भूख से अकुलाई आंतों को, टुकड़े का सहारा बहुत होता है। चलो टुकड़ा बन जाएं, चलो टुकड़ा बन जाएं। सर्द जब रिश्ते हो जाएं, ग़ैरों का सहारा बहुत होता है। चलो रिश्ता बन जाएं, चलो रिश्ता बन जाएं। देश पर संकट हो तो, वीरों का सहारा बहुत होता है। वीर जो बन ना पाएं, गीत वीरों के गाएं। ख़ुदा तो बन ना पाए, चलो इंसां बन जाएं।’ मौलिक सी धुन थी चचा। कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग मंगा कर आपको सुनवाऊंगा।

     

    —जरूर जरूर। अपनी बी तौ सुना!

     

    –मैंने भी बीच-बीच में भावसाम्य के कारण अपनी कविताएं सुनाईं, पर दुष्यंत के हवाले से। जब ज्योत्सना सुना रही थीं, तब अपने वक्तव्य की शुरुआत बैठे-बैठे सोच रहा था, ‘पीर जब पर्वत सी हो, ग़ज़लों का सहारा बहुत होता है। चलो गंगा बन जाएं, चलो गंगा बन जाएं।’ पर जब मेरी बारी आई तो इस तत्काल की तुकबंदी को भूल गया। लगभग एक घंटे दुष्यंत संदर्भित बोला। क्या बोला? फिर बताऊंगा।

     

     

    wonderful comments!