Homepage>
  • chaure champu
  • >
  • पाकिस्तान में तालिबानी भारत में गालीबानी
  • पाकिस्तान में तालिबानी भारत में गालीबानी

     

    —चौं रे चम्पू! भौत देर ते गुम्म बैठौ ऐ, तेरी चक्करदार खोपड़ी कहां घूम रई ऐ रे?

     

    —चचा! चक्कर पकड़ में नहीं आ रहा। इतिहास, पुराण, अतीत, वर्तमान, भविष्य सभी जगह चक्कर लगा के खोपड़ी बार-बार चुनाव पर लौट आती है। नई-पुरानी चैनलों के युवा पत्रकार चटख़ारेदार बयानों को रिकार्ड करने की फिराक में यहां-वहां भटक रहे हैं। विकास, रोज़गार, शिक्षा की बातें उन्हें उबाऊ लगती हैं। नफ़ासत भरे बयान रिकार्ड करके लाओ तो चैनल उस टेप को इरेज़ करके दोबारा दौड़ा देती है— जाओ नफ़ासत की नहीं नफ़ीसा की बातें लाओ, श्वेतकेशी सुन्दरी पर अश्वेत बयान लाओ। लालू का मंच कहां गिरा यह महत्वपूर्ण नहीं है, लालू का बयान कहां गिरा, अब यह महत्वपूर्ण है। लौह-पुरुष बनाम मोम-पुरुष, निडर नेता बनाम डरावना नेता, मज़बूत नेता बनाम बलबूत नेता, जय हो बनाम भय हो, माया मैया बनाम मेनका मैया, मुदिया बनाम बुढ़िया-गुड़िया, तलवार बनाम रोलर-बुलडोजर, कोई मज़ेदार मुकाबला लाओ न भैया! सो चचा, कैमरा और माइक लेकर नए-नए मीडिया-चूज़े गरमी में स्टोरी चूज़ कर रहे हैं, और इस घात में हैं कि नेता कहां टॉक लूज़ कर रहे हैं।

     

    —तौ ऐसौ का कहि रए ऐं नेता लोग?

     

    —खुल कर गाली दे रहे हैं और चैनल दर्शकों की रिक्तस्थान पूर्ति वाली परीक्षा ले रहे हैं।

     

    —सो कैसै?

     

    —देखो चचा! नेता ने अपने वक्तव्य में मातृ-प्रधान अथवा कोई अवैध पारिवारिक संबंधवर्धक गाली दी, गाली अभद्र है, भदेस है, चैनल पर सुनाई नहीं जा सकती, सो उतने स्थान का ऑडियो गायब कर दिया जाता है। अब तुम अनुमान लगाओ कि क्या गाली दी होगी, जो उतने स्थान में फिट बैठे। परिवार में अच्छी खासी क्विज़ हो जाती है। गालियां हम मुंह से नहीं निकालते, ये बात अलग है, लेकिन भारत में कौन होगा जिसकी मस्तिष्क-वीथिका में एक मोटा-सा गाली-ज्ञान-कोश न रखा हो। इन दिनों युवाओं का गाली-ज्ञान बेहतर पाया जा रहा है। यह बात भी विचारणीय है कि गधा, कुत्ता, लंगूर, पूतना, भैंसा, जल्लाद आदि गाली हैं कि नहीं।

     

    —चुनावन में गारी तौ पहलै ऊ देते।

     

    —तब कैमरे नहीं होते थे न चचा! ‘कह मरे’ होते थे, जो कह मरा सो कह मरा। पाकिस्तान इन दिनों परेशान है तालिबानियों से और भारत दुःखी है गालीबानियों से।

     

    —वाह! गालीबानी अच्छौ सब्द ऐ! गालीबानी यानी बानी में गाली।

     

    —पहले लौहपुरुष कहा जाता था सरदार पटेल को। उन्होंने कहा था कि बोलने में मर्यादा मत छोड़ना, गाली देना तो कायरों का काम है।

     

    —तौय कैसे मालूम कै उन्नैं जे बात कही?

     

    —चचा, ज़िम्मेदार वोटर हूं, ऐसे ही कुछ नहीं बोलता। किताब मंगा लो ‘सरदार पटेल के भाषण’, पृष्ठ संख्या दो सौ बत्तीस, ऊपर से पांचवी लाइन। ये एफ.एम. वाले सिड के चुटकुलों की किताब नहीं है। धांसू किताब है, मैंने पन्ना-पन्ना पलट कर देखी है। और मालूम है पलटू साहब क्या कह गए हैं— ‘गारी आई एक थी, पलटै भईं अनेक, जो पलटू पलटै नहीं, रहै एक की एक’। गालियों का पलटवार ही हमें गालीबानी बनाता है। गालीदाताओं को अपनी गालियों पर गर्व है क्योंकि चाहिए एक अदद कुर्सी। चचा, त्रेता युग में एक राक्षसी थी सुरसा, जिसके मुंह में हनुमान घुसे और मच्छर बन कर निकल आए थे सहसा। विश्वस्त सूत्रों से यानी इंडिया टी.वी. टाइप एक चैनल से ज्ञात हुआ है कि एक बहन और थी उसकी, जिसका नाम था सुरसी। वह सुरसी ही इस कलिकाल में बन गई है कुर्सी। इसके मुंह में आदमी मच्छर बन कर घुस जाता है लेकिन थोड़ी ही देर में गाली-गलौज की सहायता से फुल मौज लेता हुआ भैंसे की तरह फंस जाता है। हमारे देश में शादी-ब्याह के मौके पर गालियां गाई जाती थीं। अब शादियों में कम चुनावों में ज़्यादा गाई जा रही हैं। राहुल भैया शादी कर लें तो चुनावों से गालियां शायद गायब हो जाएं। प्रियंका दीदी कुर्सी से पहले शादी ज़रूरी मानती हैं। वरुण को भी चचेरे भाई की शादी में नाचने का मौका मिलेगा तो वह अपने भाषणों से किसी धर्म पर ‘इमोसनल अत्याचार’ नहीं करेगा। चचा, कुर्सी पे बैठे, न तो कोई मच्छर न कोई भैंसा, वो हो आदमी जैसा।

     

    —बिरकुल ठीक। और का कह रई ऐ प्रियंका?

     

    —पी.एम. की कुर्सी पर भैया को देखना चाहती हैं, लेकिन शर्त वही— पहले सेहरा फिर कुर्सी। राहुल भैया से कई सालों से मिन्नतें चल रहीं हैं पर वे अपनी लजीली-सजीली मुस्कान के साथ टाल जाते हैं। उन्हें कोई कैसे समझाए कि ये कम्बख़्त कुंवारापन तो एक ग़ैर-कांग्रेसी परंपरा है।

     

    पाकिस्तान में तालिबानी भारत में गालीबानी

     

    wonderful comments!