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    चौं रे चम्पू

     

    —अशोक चक्रधर

    –चों रे चम्पू! तू हर साल नए साल कौ कारड भेजौ करतो, अब नायं भेजै का?

    —हां चचा, दस साल हो गए, छपवा कर डाक से नहीं भेज रहा। कितने ही लोगों के पते बदल गए। काफी कार्ड लौट-लौट कर वापस आने लगे थे।

    —हमाए पास तौ सन अस्सी ते सन चार तक के सिगरे कारड रक्खे ऐं तेरे। पतरौ सौ लिफाफौ और पतरे पतरे कारड और प्यारी सी कबता।

    —पसंद करते थे लोग। नवासी से शुरू किया था। तब चार-पांच सौ प्रेमी थे। दो हज़ार पांच तक पांच हज़ार हो गए। उन दिनों यही अपना सोशल मीडिया हुआ करता था। वर्ष के अंत में एक सप्ताह तक घरेलू लघु उद्योग जैसा नज़ारा रहता था। चावड़ी बाज़ार से कार्ड के लिए मोटा और लिफ़ाफ़े के लिए पतला कागज़ लाना। लिफ़ाफ़ों का बनना। अनेक वर्ष तक मिकी पटेल उसके मुखपृष्ठ को डिज़ाइन करते थे। छप कर आते थे तो घर-दफ़्तर में सब लग जाते थे काम पर। कार्ड मोड़ना। डाई मशीन ने टेढ़ा फोल्ड कर दिया हो तो उन्हें छांटना। पांच हज़ार कार्डों पर हस्ताक्षर करते-करते उंगलियां जवाब दे जाती थीं। फिर बाल-गोपाल लिफ़ाफ़ों में डाला करते थे। सारी लिस्ट के स्टिकर बन जाते थे। पते काट-काट कर चिपकाए जाते थे, टिकिट लगाई जाती थीं। दो अटैचियों में भर कर डाकखाने ले जाते थे।

    —डाकखाने वारे ऊ घबराय जाते हुंगे।

    —नहीं! पहले कुछ कार्ड उन्हीं लोगों के नाम होते थे। वे पढ़कर मुस्कुराते हुए धन्यवाद देते थे। फिर अटैचियां खुलती थीं। कई वर्ष तक कवि अल्हड़ बीकानेरी मदद करते रहे। वे जंगपुरा पोस्ट ऑफ़िस के पोस्ट मास्टर थे। क्या रुतबा था उनका। सबसे पहले मेरी डाक की सॉर्टिंग होती थी। दनादन मुहर के ठप्पे लगते थे। बड़ा सुख मिलता था उनकी ठप्पागति देखकर। कभी रूपक ताल में कभी दादरा या तीनताल में ठप्पे मारते थे। डाकखाने से लौटते थे तो लगता था जैसे किसी भव्य संगीत-समारोह से लौट रहे हैं। बाद के वर्षों में अल्हड़ जी ने एक श्रम कम करा दिया। टिकिट चिपकाने का। फ्रैंकिग मशीन सारे कार्डों पर मुहर लगा देती थी। ठप्पा-संगीत का सुख जाता रहा, लेकिन कार्डों की सही सही गणना हो जाती थी।

    —फिर बंद चौं कद्दए?

    —एक तो अल्हड़ जी रिटायर हो गए, दूसरे, डाक टिकिट भी मंहगी हो गईं। उनासी में बीस पैसे की लगती थी, सन चार में शायद चार रुपए की हो गई थी। तीसरी दुविधा इससे बड़ी थी। प्रेमी बढ़ते जा रहे थे, लिस्ट को कितना भी ठीक कर लो, कोई न कोई गड़बड़ी रह जाती थी। सबसे बड़ी गड़बड़ी यह हुई कि उन लोगों के घरों में भी कार्ड पहुंच गए, जिनकी अंत्येष्ठि में शामिल हो चुका था। सन दो हज़ार दो में मेरे एक लिफ़ाफे का फ़ोटो उज्जैन के अख़बारों में छप गया जो श्री शिवमंगल सिंह ’सुमन’ के नाम था। अपनी लिस्ट मैंने नवम्बर के पहले सप्ताह में ठीक की थी, और सत्ताईस नवम्बर को उनका देहांत हो गया। कार्ड उनके घर पहुंच गया और किसी पत्रकार के हाथ लग गया। फिर क्या था अखबारों ने मेरी भर्त्सना शुरू कर दी। हमारा कवि दिवंगत हो गया और ये शुभकामना भेज रहे हैं। मेरे दिल को बड़ा मलाल हुआ चचा।

    —फिर का भयौ?

    —फिर डाक से भेजना बंद कर दिया। ई-मेल युग आ गया। हिंदी में ई-मेल भेजना तो बीस साल पहले शुरू कर दिया था, पर तब ई-मेल एड्रैस होते ही कितने थे। पुत्र अनुराग की मेहरबानी से पिच्चानवै में ही अपने नाम का डोमेन था अपने पास। सर्वर के लिए हर साल मोटी रकम डॉलरों में अमरीका भेजा करते थे। अब तो भारत में भरपूर इंटरनेट युग आ गया। फेसबुक पेज पर दो-चार क्लिक में ड़ेढ़ लाख लोगों तक पहुंच हो जाती है।

    —चंदो चची वारौ याद ऐ तोय?

    —कुछ पंक्तियां तो याद होंगी। कविता थी, ‘गया उनासी’। बीता बरस बात हुई बासी, पूरी हो गई बारहमासी। गया उनासी। भारत के हालात सियासी, बजा स्वार्थ का भीमपलासी। गया उनासी। नेता हुए अंधविश्वासी, तंत्र-मंत्र साधू-सन्यासी। गया उनासी। चंदो चची झूल गई फांसी, दादा जी को खुर्रा-खांसी। गया उनासी। ख़ुशहाली सांपों ने डस्सी, हास्य-व्यंग्य की पीयो लस्सी। आया अस्सी। कवित लंबी थी, इतनी याद है, लेकिन चचा पैंतीस साल बाद भी चंदो चची और जुम्मन काका की औलादों के लिए भारत नहीं बदला। मैं तो सन पंद्रह से भी अनुरोध कर रहा हूं। छोटा सा आग्रह, छोटा अनुग्रह। उम्मीद है तू सताएगा नहीं सन दो हज़ार पंद्रह।

     

    —बच्चे के बस्ते को हर दिन के रस्ते को, आपस की राम राम प्यार की नमस्ते को, खादी को मलमल को कुर्सी की मखमल को, गड़बडि़यां देख उठी हृदयों की हलचल को, उस मीठी चिन्ता को, गली से गुज़रते जो, पूछताछ करे हालचाल की, शुभकामनाएं नए साल की। आंगन के फूल को नीम को बबूल को, मेहनती पसीने को चेहरे की धूल को, सोचते दिमागों को नापती निगाहों को, गारे सने हाथों को डामर सने पांवों को, उन सबको जिन सबने दिन रात श्रम करके, सडक़ें इमारतें बनाईं कमाल की, शुभकामनाएं नए साल की। फ़ैशन को डिज़ाइन को चड्ढी बनियाइन को, जीवन के हर पहलू रियल को डिवाइन को, चुनरी को गोटे को झूला को झोटे को, घूमर घुंघरू वाले पूरे परकोटे को, हाई फ़ाई म्यूजिक़ में बिना किसी झिकझिक के, मस्ती मिले सदा सुर की ताल की, शुभकामनाएं नए साल की। पोयट को राइटर को उनके टाइपराइटर को, कम्प्यूटर प्रिण्टर को उनके प्रोपराइटर को, सोशल मैसेंजर को फाइल मैनेजर को, पुलिस के सिपाही को हवलदार मेजर को, उन सबको जिन सबकी बिना बात तनी हुई, तिरछी हैं रेखाएं भाल की, शुभकामनाएं नए साल की। हर नारी को नर को व्यूअर को लिस्नर को, हर चैनल दिखलाए माध्यम के मैनर को, स्नेहा अनुराग को, बागेश्री राग को, दिल के उजियारे को, प्यारी को प्यारे को, छिप छिप कर किए गए आंख के इशारे को, दूसरा भी समझे और ख़ुशबू रहे ज्यों की त्यों, हमदम के भेंट के रुमाल की, शुभकामनाएं नए साल की। हरियाले खेत को मरुथल की रेत को nnn

    रेत खेत बीच बसे जनमन समवेत को

    धरती के कन-कन को भारत के जन-जन को

    बच्चे बूढ़े जवान मन की हर खन-खन को

    खुशियां मिलें और भरपूर खुशियां मिलें

    चिन्ता नहीं रहे रोटी दाल की, शुभकामनाएं नए साल की।

    टी. वी. के चैनल को प्रोड्यूसर पैनल को

    सत्यमेव जयते की थिंकिंग ओरिजिनल को

    भावों की बरात को कलम को दवात को

    हर अच्छी चीज़ को हर सच्ची बात को

    हौसला मिले और सब कुछ कहने वाली

    हिम्मत मिले हर हाल की, शुभकामनाएं नए साल की।

    टाले घोटाले को सौम्य छवि वाले को

    सदाचारी जीवन को शोषण पर ताले को

    जीवन के ताप को ताप के प्रताप को

    ताप के प्रताप से दमकते हुए आपको

    पहुंचाता हूं अपने दिल के कहारों से

    उठवाई हुई दिव्य शब्दों की पालकी, शुभकामनाएं नए साल की।

     

    wonderful comments!