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  • थ्री टी से टी थ्री तक
  • थ्री टी से टी थ्री तक

    –चौं रे चम्पू! एक हफ़्ता में बनारस, पटना, रांची, मुंबई, रायपुर, आगरा, अरे घर में टिकै कै नायं?

    –चचा, पाँव में चक्कर है। आपके चम्पू का नाम ही ऐसा है। सभी जगह हवाई जहाज से गया। आगरा बाई रोड, और सिर्फ बनारस से पटना रेल से गया। पिछले दिनों जब से दिल्ली में टर्मिनल थ्री खुल गया है, सुबह या शाम की सैर हो जाती है। सुबह-सुबह की फ्लाइट से जाओ, बोर्डिंग गेट तक डेढ़ दो किलोमीटर की पद-यात्रा करके पहुंचो। ऐसे ही लौटने में। क्या दिव्य टर्मिनल बनाया है चचा! दुनिया भर के हवाई अड्डे देखे, अपना टी थ्री भी कम नहीं है।

    –मजा आय रए ऐं तेरे! पहलै जातौ ओ बसन में, रेलगाड़ीन में, अब उड़ै हवाईजहाजन में।

    –चचा, तीस-पैंतीस साल पहले रेल में संघर्ष और इंसानी सम्पर्क का जो आनन्द था वह इस हवा-हवाई दौर में नहीं है। अब इंटरनेट और सहयोगी सारा काम कर देते हैं। कविसम्मेलनों का सफर सामान्य थ्री टी यानी थ्री टायर से शुरू हुआ था और टी थ्री यानी टर्मिनल थ्री तक आ गया। थ्री टायर में लकड़ी के फट्टे होते थे, गुदगुदी सीट नहीं होती थीं। बुकिंग क्लर्क ने कह दिया कि जगह नहीं है तो मानना पड़ता था, लेकिन पिछवाड़े से एजेंट के ज़रिए टिकिट मिल जाती थी। आरक्षण न मिले तो पांच रुपए में कुली-कृपा से जनरल बॉगी में किसी भी बर्थ पर अंगोछा पड़ जाता था। कुली कौशलपूर्वक खिड़की से अन्दर कर देते थे। कई बार आपका धड़ अन्दर, पैर बाहर, अटैची बीच में। अन्दर पहुंच कर ऐसा सुख जैसे कोई किला फतह कर लिया हो। खिड़कियों से ठंड में ठंडी और गर्मियों में गर्म हवा आती थी। सुविधाएं आईं होलडोल बिस्तर युग में।

    —बिस्तर युग की बात बिस्तार ते बता।

    —बर्थ के साइज़ का एक ऐसा होलडोल आता था चचा, जिसमें फोम लगी रहती थी। दोनों ओर खांचे। सिरहाने की तरफ़ कविता की डायरी, लेखन-डाक सामग्री और फूंक वाला तकिया और दूसरी तरफ़ चादर-कम्बल और खाने का टिफिन। दो बक्कल वाली चमड़े की छोटी सी अटैची में कपड़े-लत्ते और मुख-मंडल सुधारक सामग्री। पानी की बोतल पर चढ़ा रहता था कम्बल का टुकड़ा ताकि पानी ठण्डा रहे। राजसी ठाठ होता था, क्योंकि डिब्बे में हमारे जैसा होलडोल किसी के पास हुआ ही नहीं करता था। अगल-बगल ईर्ष्या की लहरें उठती थीं। देखो हम लकड़ी के फट्टे पर पड़े हुए हैं और पट्ठा गुदगुदे गद्दे पर मौज कर रहा है। अब हवाई जहाज में फ्रिज से निकली हुई ठण्डे पानी की बोतलों में वह मजा ही नहीं है जो उस झरी के पानी में आता था। टी.टी. से संवाद का अलग मजा। बर्थ के लिए उसके पीछे ऐसे भागते थे जैसे गैया के पीछे बछड़े लगे रहते हैं। दूध दे दे मैया, सीट दे दे भैया।

    —टी.टी. कवीन की मदद तौ करते हुंगे?

    —कवि हैं, जानने के बाद कुछ तो खुश हो जाते थे। अनेक टीटी स्वयं कवि होते थे, बिना पैसे लिए बर्थ भी दे देते थे। कोई-कोई खड़ूस टकरा जाता था, मैं क्या करूं कवि हैं तो? हर कोई, कोई न कोई काम करता है। वहां से पैसा नहीं लाओगे क्या? हम समझ जाते थे, निगाहों-निगाहों में वह आश्वस्त हो जाता था, बर्थ मिल जाती थी। एक बार मैं और सुरेन्द्र शर्मा कोलकाता से आ रहे थे। हर हालत में दिल्ली पहुंचना था। टी. टी. के लिए दस-पन्द्रह रुपए काफी हुआ करते थे। सुरेन्द्र जी ने बंगाली बाबू को सौ का नोट थमाया, दादा, दो बर्थ का इंतज़ाम कर दो। दादा बोले खुल्ला नहीं हैं, छुट्टा देओ। सुरेन्द्र जी ने कहा पूरे रख लीजिए। सौ का नोट देख कर बंगाली बाबू घबरा गया। कहने लगा, कौमती देओ, कौमती देओ, रेलवे में चौलता, पर इतना नईं चौलता, कौमती देओ! चचा, उस समय भ्रष्टाचारी में भी एक आनुपातिक ईमानदारी हुआ करती थी। आटे में नमक के बराबर लिया जाता था। आज टाटा का नमक रह जाता है, आटा गायब हो जाता है। लेने वाला टाटा भी नहीं करता। थ्री टी का जमाना टी थ्री से अच्छा था।

    –जनरल बौगी आज ऊ लगी भई ऐं। फट्टा वारी! हिम्मत ऐ तौ लग लाइन में!

    —चचा, तपस्या का कुछ तो फल मिले, अब लाइन में नहीं ऑन-लाइन रहने दो!

     

    wonderful comments!