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  • कहानी का एंड कहां हुआ है
  • कहानी का एंड कहां हुआ है

     

     

     

    —चौं रे चम्पू! चन्द्र मोहन उर्फ चांद खां की का खबर ऐ? ताजा हालात पे प्रकास डाल।

     

    —चचा, प्रकाश डालने वाला चन्द्रमा इन दिनों अमावस्या का शिकार है। उजाले खत्म, जाले बढ़ गए। जहां तक ताज़ा हालात की खबर का सवाल है, कुछ भी ताज़ा नहीं है, सब बासी है। परकीय प्रेम कोई नई बात नहीं है। मौज-मज़े के बाद आमतौर से प्रेमीगण  बेवफाई के लिए ज़माने के आगे ग़ुस्सा हाई करते हुए सफाई देते हुए दिखाई देते हैं और परिणाम होता है जग-हंसाई।

     

    —पहलै नायं सोचैं?

     

    —प्रेम अंधा होता है न। चारों तरफ की फूट जाती हैं। लेकिन, प्रेम न तो जन्मांध होता और न अंधत्व रहता है सदा के लिए। कभी-कभी फूटी आंखें खुलने लगती हैं। तब तक बन चुकती है एक कहानी। आज चांद-फ़िज़ा की कहानी पर कितने ही प्रोड्यूसर फिल्म बनाना चाहते हैं। एक कम्पनी ने तो फ़िज़ा को ऑफ़र भी दे दिया है कि अगर वह अपनी सच्ची कहानी बताए तो चौबीस करोड़ रुपए फौरन हाज़िर हैं।

     

    —कित्ते करोड़?

     

    —चौबीस करोड़! असली कहानी के नाम पर प्रोड्यूसर चार सौ चौबीस करोड़ कमा लेगा, उसे मालूम है। उसे मालूम है कि मनुष्य सदा का झांकू है। दूसरों के जीवन में झांकने में हर किसी को मज़ा आता है। चचा, मज़ा तो तब आए जब एक नहीं दो फिल्में बनें। कोई प्रोड्यूसर भूतपूर्व उपमुख्यमंत्री और अभूतपूर्व अमुख्य-प्रेमतंत्री चन्द्रमोहन से भी उसकी असली कहानी सुने।

     

    —कहानी तो कहानी ऐ, कहानी कभी असली है नायं सकै।

     

    —क्या बात कह दी चचा! धोखे और बेवफाई के मामले में दूसरा ही दोषी नज़र आता है, इसीलिए मैंने कहा कि फिल्म बनें तो दो बनें। जो प्रोड्यूसर फिज़ा को चौबीस करोड़ देना चाहता है उसके लिए भी ये एक धांसू आइडिया है। चौबीस करोड़ चन्द्रमोहन को भी दे आए और इंटरवल के बाद उसकी कहानी दिखाए। प्रयोग बड़ा सफल रहेगा और इससे पता चलेगा कि इंसान को दूसरे इंसान धोखा नहीं देते, वह अपने आपको दूसरों से ज़्यादा धोखा देता है। आज अनुराधा बाली उर्फ फिज़ा कह रही हैं— ‘चांद ने अभी तक मेरी मुहब्बत देखी है गुस्सा नहीं देखा। मैं पक्की मुसलमान हूं’। चचा, खुद सोचो, कौन मानेगा इस बात को कि इन दोनों ने मुस्लिम धर्म इसलिए अपनाया क्योंकि इस धर्म में उनकी आस्था थी। मुस्लिम धर्म एक महान धर्म है पर ये दोनों प्रेमी किसे धोखा दे रहे हैं? इनके इरादे, वादों से नहीं, बुरादों से बने थे। दोनों ने ऐसे ताशों का महल बनाया, जिसमें राजा रह पाया न रानी सब जोकर बन कर रह गए। अच्छा, ये बताओ चचा कि फिल्म चलेंगी कि नहीं?

     

    —धड़ल्ले ते चलिंगी।

     

    —हां, फ़िल्मी तरकारी के लिए हर मसाला है इसमें। बाली नामक बाला ने जब फ़िज़ा बनकर फ़िज़ा बदलने की कोशिश की तो चन्द्रमोहन को उसके बेटे ने, बीवी ने, भाई ने इतना पीटा कि चांद के चेहरे पर परमानैंट दाग बन गए। दरअसल, इनका प्यार स्थायी समर्पण का परमानैंट ख़ुमार नहीं था, पांच दिन का बुखार-सुरूर था। सुरूर-बुखार उतर गया तो उतर गया चेहरों से नूर, दोनों हो गए दूर, एक दूसरे के लिए क्रूर और अब दोनों बता रहे हैं खुद को मजबूर। चचा, कहा जाता है कि शादी से पहले स्त्री चन्द्रमुखी नज़र आती है और शादी के बाद ज्वालामुखी। मंच से ये बात कवि लोग कहते हैं तो सारी जनता हंसती है, क्योंकि सबको अपने-अपने अनुभवों के आधार पर बात सच्ची लगती है। पर ये बात सच्ची है नहीं।

     

    —तूई सच्ची बात बताय दै।

     

    —चचा, पहले चन्द्रमुखी में छिपा हुआ ज्वालामुखी नज़र नहीं आता और बाद में ज्वालामुखी में छिपी हुई चन्द्रमुखी नज़र नहीं आती। पहले चन्द्रमोहन में छिपा कामदोहन नज़र नहीं आता और बाद में कामदोहन में छिपा चन्द्रमोहन नज़र नहीं आता। अलबत्ता, प्रेम तो उन दोनों ने ज़रूर किया होगा। भले ही सुरूर-बुखार कि तरह किया हो, अल्पजीवी। दीर्घजीवी हो सकता था अगर इनका प्रेम होता आत्मा की आवाज़, सामने तख्त होते न ताज, आलोचक समाज होते न प्रेम-कबूतरों के ऊपर बाज, और अचानक गिरने वाली गाज भी न होती। अभी क्या है, अभी तो इंतज़ार करो चचा, कहानी का एंड कहां हुआ है।

     

     

    wonderful comments!