Homepage>
  • chaure champu
  • >
  • ऐसा दिन कब आएगा 
  • ऐसा दिन कब आएगा 

     

     

     

    —चौं रे चम्पू! कल्ल तैंनैं छब्बीस जनवरी की परेड देखी?

     

    —देखी चचा। भारत के करोड़ों लोगों के साथ मैंने भी देखी टेलीवीज़न पर। फ्रांस की फौज देखी, उनके संगीत-बैंड की मौज देखी। प्रधानमंत्री को अपनी पगड़ी की लंबी लाग को संभालते देखा। राष्ट्रपति जी की पुत्री को फ्रांस के राष्ट्रपति के लिए दुभाषिए का काम करते देखा। मंत्री देखे संत्री देखे, दर्शक जनतंत्री देखे। सेनाओं और शस्त्रों की ताक़त का प्रदर्शन स्वाभिमान से भर रहा था। राजनीति से ऊपर उठकर भारतीयता की भावना बलवती होती हुई दिख रही थी। शानोशौकत की चलती-फिरती तस्वीरें नयनों को मोहित कर रही थीं। शहीद मोहन नाथ गोस्वामी की पत्नी जब अशोक चक्र सम्मान ले रही थीं तब उनका मेकअपविहीन चेहरा देख कर आंखें सजल भी हुईं।

     

    वा लाली ऐ देखि कै मेरौ ऊ जी भरि आयौ लल्ला!

     

    —दुख होता है चचा। सैल्यूट के लिए हृदय के हाथ मस्तिष्क के ललाट तक चले जाते हैं। पता नहीं कब ख़त्म होगा दुनिया से आतंकवाद का यह सिलसिला? लेकिन जब एनएसएस और एनसीसी के लड़के-लड़कियों के चेहरे का आत्मविश्वास देखा तो भविष्य के प्रति आश्वस्ति का भाव आने लगा।

     

    —राजपूताना रायफल्स के जवानों के सघन गलमुच्छ देखे आपने?

     

    —हां देखीं उनकी मूंछ। ऐसी मूंछन कौ रखरखाव मुस्किल होतौ होयगौ?

     

    —आपको पता है सेना में मूंछ रखने वाले जवानों को अलग से एक भत्ता दिया जाता था, ’मूंछ अलाउंस’। मूंछ रखना सेना में अनिवार्य नहीं है, लेकिन मुझे लगता है कि जो जवान मूंछ नहीं रखते थे उनके द्वारा एक गुप्त ’मूंछ विद्रोह’ हुआ होगा, जिसकी ख़बर किसी को नहीं लग पाई। वह विद्रोह अंदर ही अंदर दबा दिया गया होगा और कहते हैं कि जनरल थपलियाल ने वह अलाउंस बंद करा दिया। अब जिसे मूंछ रखनी हैं, अपने ख़र्चे पर ही रखता है। एक बात और देखी?

     

    —कौन सी बात?

     

    —जब मूंछधारी जवानों का दस्ता आया तो हमारे युवा राज्यमंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर उनके सम्मान में सपत्नीक खड़े हो गए। पूरे वीआईपी प्रकोष्ठ में अकेला युगल। एक बात और बताऊं! मेरे एक श्वान-प्रेमी पड़ोसी उस समय खड़े हो गए जब कुत्तों की स्क्वैड आई। मनुष्यों के साथ क्या क़दम से क़दम मिला कर चल रहे थे। कोहरे की चादर से निकल-निकल कर एक से एक भव्य झांकियां आ रही थीं। मध्य-प्रदेश के सफेद बाघ। चंडीगढ़ का योगाभ्यास। ओड़िसा का राजकीय वैभव। खैरागढ़ का संगीत विश्वविद्यालय। पश्चिम बंगाल का बाउल संगीत। तमिलनाडु की ‘थोड़ा’ आदिम जनजाति। उत्तरप्रदेश का झुकी कमर का ज़रदोज़ी कारीगर। और इत्तेफ़ाक देखिए कि जब कर्नाटक के कॉफ़ी उत्पादन की झांकी आई तो उस समय हम कम्बल ओढ़कर कॉफ़ी पी रहे थे। विराट पुतलों से भरे टैब्लो मनमोहक थे। एक झांकी पर मेरा लिखा हुआ गीत भी बज रहा था चचा!

     

    —तेरौ कौन सौ गीत?

     

    —पंचायती राज मंत्रालय की झांकी में था। पंचायत में महिलाओं की भागीदारी का गीत।

     

    —बता तौ सई!

     

    —सुनिए, गीत था, ’नारी है सरपंच, गाँव की, समझे दुनियादारी! अरे लाई भागीदारी। आओ पंचायत में। आओ मिलकर रखें सफ़ाई, मिलकर करें पढ़ाई, मिलकर हम कम्प्यूटर सीखें, मिलकर करें कमाई। आओ पंचायत में! संग पुरुष के अपनी भी तो होगी साझेदारी, अरे पूरी हिस्सेदारी! आओ पंचायत में! ताक़त के संग-संग, आई है, नारी में ख़ुद्दारी। अरे पूरी ज़िम्मेदारी। आओ पंचायत में!!’

     

    —जे धुन तैनैं ई बनाई का?

     

    —कोई भी गीतकार जब गीत लिखता है, तो कोई तो धुन शब्दों के साथ आती ही है। संगीत-निर्देशक को भी मैंने गाकर ही सुनाया था। उन्होंने उसे परिमार्जित कर दिया। डिजिटल इंडिया के मंच पर युवा गा रहे थे, ’सब काम करेंगे ’डिजिटल’! स्वच्छ भारत की झांकी में कैलाश खेर गा रहे थे, ’विश्व कहेगा जय भारत’। कुछ और भी सोच रहा था परेड देखते वक़्त।

     

    —वो ऊ बताय दै।

     

    —मेरा पुत्र ऑस्ट्रेलिया में रहता है, उसे यहां की छब्बीस जनवरी याद आ रही होगी। और कमाल की बात ये है कि छब्बीस जनवरी ऑस्ट्रेलिया का राष्ट्रीय दिवस भी है। सिडनी में भी रंगारंग कार्यक्रम चल रहे होंगे। एक बार छब्बीस जनवरी हमने ऑस्ट्रेलिया में मनाई थी। एक बात और आ रही थी ज़ेहन में कि हमारे देश की वह छब्बीस जनवरी कब आएगी जिसमें पाकिस्तान की सेना की टुकड़ी और उनका संगीत-बैंड भी शामिल हो?

     

    —ऐसौ दिन तब आवैगौ जब आतंकबाद न होय। हम मिलि कै या भस्मासुर ते लड़ें। 

     

    wonderful comments!