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  • एक बटन की छुअन से सीट भसम हो जाय
  • एक बटन की छुअन से सीट भसम हो जाय

     

     

    —चौं रे चंपू! पिछले हफ़्ता सबसे खराब बात का भई? जे बता!

    —चचा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी ने अपना श्राप वापस ले लिया। ये बात बड़ी खराब लग गई। उन्‍होंने उन सांसदों को, जो सदन में हंगामा कर रहे थे, श्राप दिया था कि जाओ तुम सब अपने क्षेत्र में हार जाओ, कोई भी न जीते। तब मुझे बड़ा अच्‍छा लगा था। ये भोले, सरल क्‍यूट से आदमी हैं सोमनाथ चटर्जी, झूठ नहीं बोलते, सच्‍चा आदमी दिल से दुआएं दे तो लगती हैं और दिल से श्राप दे तो चचा वो भी लग जाता है। ‘निर्मल को न सताए ये जाकी मोटी हाय, …खतम हो जाय’। लोकसभा में स्पीकर से ज्यादा निर्भल कोई नहीं होता है, वो मोटी हाय वाला और मोटी खाल वाला हो जाता है धीरे-धीरे। पर हमारे सोमनाथ चटर्जी मोटी खाल के होते हुए भी मोटी खाल के हुए नहीं। उनकी हाय लग सकती थी। अख़बारों में उनका बयान छप गया। उन्‍होंने पढ़ा, उनको लगा कि भैया श्राप क्‍यों दूं किसी को, सो वापस ले लिया। नहीं नहीं नहीं, अब वो वरदान दे दिया कि जाइए जिनको मैंने कहा था ये हार जाए, वो जीत जाए।

    —ऐसे ना होय करै, आज श्राप दे दो और कल वरदान दे दो, श्रराफ गयौ, तो गयौ। बाकी शास्‍त्रन में तोल लेके भयौ कि श्रराफ तब तुटोगो जब ऐसे होयो, तो कैसे होयो।

    —कैसे का होय चचा, अगर जीतना-हारना इस पर निर्भर करता है कि वोटर की निगाह में आप कैसे हैं। सोमनाथ चटर्जी ने जिस समय श्राप दिया था तो उनका कहना यह था कि आपको आपके क्षेत्र का वोटर भी देख रहा है और उन्‍होंने कहा कि देशवासियों देख लो तुम्‍हारे सांसदों का आचरण क्‍या है। इन्‍हें एक रुपया पैसा नहीं मिलना चाहिए। उनके भत्ते कट जाने चाहिए। इनका आचरण इतना खराब है। तो वोटर देखेगा और इनके आचरणों को जानेगा कि इतना खराब है इनका रवैया, तो वोट नहीं डालेगा भैया। तभी तो हारेगा ना। सोमनाथ चटर्जी के कहने से कोई हार जाएगा क्‍या। वो तो वोटर के …. जा रहा है तो उनका तोड़ यही है कि सांसद अपने इलाके में डंडोती परिक्रमा लगाए और बताए कि मेरा आचरण संसद में तो खराब था, पर यहां एकदम झकास है। इसलिए मुझे वोट देना। तभी वो वरदान होगा। अगर वोटर कहेगा कि वोटर को न सताइए जाकी मोटी हाय, एक बटन की छुअन से सीट भसम हो जाए। असल श्राप देने वाला और वरदान देने वाला तो वोटर है। चचा संसद तो एक खोटर है। जहां खोटे काम होते हैं। नोटरी तो वोटर है जो नोट करता है और लॉटरी भी वही खोलता है। जनतंत्र में किसी एक व्‍यक्ति के श्राप या वरदान से कुछ नहीं होता चचा। जनता ही वरदान दे सकती है, जनता ही श्राप दे सकती है। जनता ही दे सकती है वरदान और जनता ही दे सकती है श्राप। चचा क्‍या समझे आप।

    —समझ गए, समझ गए लल्‍ला, समझ गए…।

     

    wonderful comments!