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  • उत्तर-कांड से पहले लंका के प्रश्न-कांड
  • उत्तर-कांड से पहले लंका के प्रश्न-कांड

     

    —चौं रे चम्पू! रावण मर गयौ, लंका-कांड समाप्त भयौ, उत्तर-कांड के पाठ चल रए ऐं, तेरे मन की रामलीला में का चल रयौ ऐ, जे बता?

    —चचा राम की गाथाएं कितने ही कवियों ने लिखीं। अपने युग और समाज की ज़रूरतों के हिसाब से कहानी में फेरबदल कर लियाया। भवभूति का उत्तररामचरितम तो करुणा का सबसे बड़ा ग्रंथ माना जाता है।  लंका-कांड का करुण रस प्राय: सभी ने यूं ही निपटा दिया।

    —का मतलब?

    —मतलब ये कि युद्ध की विभीषिका के बाद किसी भी व्यवस्था में जो संकट आते हैं, उन्हें कोई विभीषण तत्काल ठीक नहीं कर सकता। मंदोदरी का विलाप, रावण के लिए कम, युद्ध के बाद आई मंदी के लिए अधिक रहा होगा। जब राम के बाण ने रावण की नाभि के अमृत-कुंड को सोख लिया, यानी उसका सारा गोला-बारूद उड़ा दिया, तब रावण के सिर एक-एक करके मंदोदरी के सामने गिरने लगे। लोकाचार के नाते मंदोदरी ने विलाप तो किया, छाती पीटी। ये भी कहा कि ‘शेष कमट सहि सकहिं न भारा, सो तनु भूमि परेउ भरि छारा’, यानी शेष और कच्छप भी जिसका भार नहीं सह सकते थे वही तुम्हारा शरीर धूल से भरा हुआ पृथ्वी पर पड़ा है। तुमने यमराज को जीता है,  वरुण, कुबेर, इन्द्र और वायु इनमें से कोई तुम्हारे सामने नहीं टिका और आज तुम्हारी भुजाओं को गीदड़ खा रहे हैं। तुम्हारे पुत्र और कुटम्बियों ने अपना पेट काट कर तुम्हारी ताकत बढ़ाई, पर हे नाथ! तुम खुद अनाथ हो गए।

    —चम्पू! हर विधवा विलाप करै है, पर जिंदगी भर नायं करौ करै।

    —वही तुमने मेरे मुंह की बात छीन ली। विलाप करते-करते मंदोदरी ने एक यथार्थवादी दोहा खुलकर गाया, सबके सामने। वो सुन लो।

    —सुना दे।

    —’भलौ भयौ पिउ मर गए, इन बच्चन के भाग, दस हजार रोटी बचीं, पोखर भर के साग।’ रावण का एक-एक मुंह हज़ार-हज़ार रोटी खाता था। तालाब भर के सब्जियां बनती थीं। लंका की स्वर्ण-मुद्राएं रावण के कार, कारनामों और अहंकार पर खर्च होती थीं। प्रक्षेपास्त्रों पर आधे से अधिक कोष जाता था। रावण के वंशज और अधीनस्थ भूखों मरते थे। मंदोदरी के सामने चुनौती यह थी कि सोने की लंका तो गई, अब कैसे बचे उसके ‘होने’ की लंका। हर महायुद्ध के बाद ‘होने’ का अस्तित्ववादी संकट आता है।  मैं हूं कि नहीं हूं। त्रास की जगह संत्रास आ घेरता है।

    —त्रास और संत्रास में का फरक ऐ रे?

    —त्रास का कारण पता होता है चचा! संत्रास के कारण लुप्त हो जाते हैं। मंदी की विभीषिका मंदोदरी और विभीषण तो समझ सकते हैं, लेकिन लंकावासियों की समझ में नहीं आ सकते।

    —तोय लंका ते का मतलब, तू तौ अयोध्या की बात कर।

    —मेरा मन तो लंका में ही अटका हुआ है।

    —चल, तौ लंका की ई बता?

    —चचा रावण-वध के बाद, सबको मालूम है कि मंदोदरी ने राम के गुण गाए। सेनाएं सरैंडर कर देती हैं। अप्रत्याशित वाणी बोलती हैं। मंदोदरी ने कहा कि यह सब मेरे पति के अहंकार का परिणाम था। कितना अच्छा हुआ कि उसे आपके हाथों मोक्ष मिला। यह मोक्ष बड़ा परोक्ष होता है चचा. मंदोदरी की अमंद-बुद्धि को मंदी की विभीषिका से लड़ना था। महंगाई, मुद्रा-स्फीति, राजनैतिक उथल-पुथल, पानी-बिजली का संकट, सब देखना था। मुद्रा कोष बढ़ाना था। विभीषण तो राम के पक्ष में थे। राम जी ने उनसे उल्टा काम करा दिया। उन्होंने विभीषण से कहा कि तुम्हारे कोष में जितनी मुद्राएं और स्वर्ण आभूषण हैं, पुष्पक विमान में चढ़कर जनता के ऊपर बरसा दो। विभीषण ने ऐसा ही किया।  वे आभूषण लंका की जनता ने कम, बन्दर-भालूओं ने ज़्यादा लूटे। सारी सम्पत्ति नीचे गिरा देने के बाद, विभीषण ने पुष्पक-चालक से कहा, वत्स अब अगला कार्य यह है कि भगवान राम को मां जानकी सहित अयोध्या ले जाना है। पॉयलट ने लंका के रनवे पर पुष्पक उतार कर विभीषण से कहा महाराज उड़ान रद्द कर दीजिए, हम स्ट्राइक पर हैं। सब कुछ लुटा दिया आपने, हमारे लिए कुछ न छोड़ा। तो, लंका कांड से उत्तर कांड में जाने के बीच में प्रश्न-कांड आ गया चचा, पुष्पक पॉयलटों की हड़ताल चल रही है।

    —राम जी कोई न कोई रस्ता निकाल लिंगे चम्पू।

     

     

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