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ऐसे बहुत से रचनाकार हैं जो कवि होने के साथ समीक्षक भी रहे हों। कविता अगर एक सचेत, जागरूक कला प्रक्रिया है तो बेहतर कविता लिखने से पहले कविता की बेहतर समझ होना भी आवश्यक होता है। समीक्षा से कविता जन्म नहीं लेती है, समीक्षा कविता के पीछे-पीछे चलती है। लेकिन फिर भी कविता के प्रतिमान क्या हैं, और व्यावहारिक समीक्षा कैसी की जाती है इसका ज्वलंत उदाहरण हैं मुक्तिबोध पर लिखी हुई उनकी तीन पुस्तकें। ‘छाया की बाद’ की लम्बी भूमिका छायावाद के बाद की कविताओं की प्रमुख प्रवृतियों को रेखांकित करती है। ‘कुछ भूमि का कुछ गगन का’ में उन्होंने अनेक अनेक रचनाकारों के कृतित्त्व का व्यावहारिक मुल्यांकन किया है। लोग मानते हैं कि अशोक जी की समीक्षा में दम होता है।