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मसलाराम काव्य संकलन

पीट लो, पीट लो,
मैं तो मरना चाहता हूं
यहां से नहीं हटूंगा,
भारत का आम आदमी हूं
एक घटना की तरह घटूंगा।
जब तक ख़ोल में हूं,
तभी तक कंट्रोल में हूं… ज़माने की इस रेलपेल में आम आदमी के होंठों से हंसी बटुए में रखी तनख़ा की तर्ह ग़ायब होती जा रही है। हर तरफ़ तनाव, बेरोज़गारी, क्लेश से त्रस्त माहौल में हंसी के ठंडे चश्में की तरह है ‘मसलाराम’ जिसकी शीतल फुहार तो तरोताज़ा करती है, मगर बर्फ़ीली पानी जिस्म की सुन्न कर देता है। मशहूर हास्य कवि अशोक चक्रधर की चिर-परिचित शैली में लिखी इस संकलन की कविताएं पाठक के सूखे होंठों पर हंसी की ताज़गी बिखेरने के साथ ही उसे ठिठककर अपने आसपास के माहौल का जायज़ा लेने पर भी मजबूर कर देती हैं।

ज़माने की इस रेलपेल में आम आदमी के होंठों से हंसी बटुए में रखी तनख़ा की तर्ह ग़ायब होती जा रही है। हर तरफ़ तनाव, बेरोज़गारी, क्लेश से त्रस्त माहौल में हंसी के ठंडे चश्में की तरह है 'मसलाराम'... "

अनुक्रम

  • मेरे शब्द
  • टीन की छत
  • बादल बदला
  • बहुत पहले से भी बहुत पहले
  • नाभिकीय ऊर्जा ओम्‌ शांति
  • यमदूत
  • मेरी आंखें
  • दुःख
  • मसला राम
  • क़ुदरत
  • तू क्या करेगा
  • मौत की जन्मपत्री
  • आरी
  • ख़ुद को चिट्ठी
  • अभी अभी रात में
  • जा
  • सामूहिक आत्महत्या
  • गोदाम
  • प्रसन्नता की सन्नता
  • माफ करिए
  • अपराध एक-आध
  • मैं पीछे-पीछे
  • चुनाव जीतने के बाद
  • तुम भी जल थे
  • क्या
  • समंदर और इंसान
  • अगर सुकून चाहिए
  • यक-ब-यक
  • मुश्किल है
  • कांटा उवाच
  • अंदर झूला
  • भीड़ और रास्ता
  • जीवन दोहे
  • यमन
  • पपुआ
  • मेहनत
  • पीर का कारोबार
  • नैन हुए जलधारे क्यूं
  • खुला निमंत्रण
  • पुलिस और पौलीटिशियन
  • एक पहेली
  • अगर कहीं मैं मैना होती
  • ध्यान दो न!
  • कटे हाथ
  • पोलखोलक यंत्र
  • तमाशा