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अशोक जी ने जो नाटक लिखे वे आवश्यकताओं के अनुरूप रचे गए। उनका एक बाल नाटक ‘बन्दरिया चली ससुराल’ को नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा ने मंचित किया। कई संस्थाओं ने उनकी कविताओं पर लम्बे-लम्बे नाटक तैयार किए। भ्रष्टाचार महोत्सव एक ऐसी कविता है जिसका रूपांतर उन्होंने स्वयं किया और दूसरे लोगों ने भी किया। मद्रास की एक संस्था ‘चौपाल’ ने उनके तीन कविताओं को मिलाकर एक नाटक बनाया। वस्तुत: अशोक जी की कविताओं में एक कथा सूत्र हमेशा विद्यमान रहता है, एक नाटकीय कथोपकथन की शैली में वे अपनी कविताओं को बुनते हैं। ‘रंग जमा लो’ में उनके नाटक, रूपक, प्रहसन इत्यादि आपको देखने को मिलेंगे। और भी पुस्तकें हैं, देखिए और प्रतिक्रिया दीजिए।