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  • व्यंग्यश्री    
  • व्यंग्यश्री    

     

     

    —चौं रे चम्पू! आनंद में तौ है?

     

    —परमानंद में। पूर्ण आनंद में। सर्वानंद में। सतचित्त आनंद में। आप सोचेंगे कि इतने सारे आनंद कैसे कहां से मिल गए। तो मैं आपके बिना पूछे ही बता रहा हूं कि कल मेरे प्रिय व्यंग्यकार आलोक पुराणिक को एक लाख ग्यारह हज़ार एक सौ ग्यारह के चैक के साथ व्यंग्यश्री सम्मान मिला था। डॉ. गोबिंद व्यास प्रतिवर्ष पं. गोपाल प्रसाद व्यास की स्मृति में उनके जन्मदिन पर इस पुरस्कार समारोह का आयोजन करते हैं। मंच पर कई नामचीन व्यंग्यकार बैठे हुए थे। ज्ञान चतुर्वेदी, हरीश नवल, सुभाष चंदर, नीरज बधवार सबने आलोक के लेखन की प्रशंसा उनके लेखन की निरंतरता को रेखांकिंत करते हुए, उनके वाणिज्यिक ज्ञान को महत्त्व देते हुए उन्हें लोकोनमुखी, जन्नोन्मुखी बताते हुए और नई भाषा का चितेरा कहते हुए कोई झूठी प्रशंसा नहीं की थी। सभी ने दिग्गज व्यंग्यकारों के नाम लिए और व्यंग्य के बारे में अपनी राय रखी।

     

    —तू अपनी राय बता!

     

    —मैंने कहा न आनंद में हूं। व्यंग्य सतचित्त आनंद नहीं है। मुक्तिबोध कहते थे कि सतचित्त से आनंद नहीं होता। अगर सचमुच सत और चित्त हैं तो वे आनंद नहीं दे सकते। सतचित्त में होती है वेदना। यह सतचित्त वेदना अंतःकरण में निवास करती है। सत इस अंतर्र्विरोधी लोकतंत्र में किसी ने किसी रूप में सतचित्त की वेदना से आहत हैं। तो चचा, सतचित्त की वेदना व्यंग्य का मूलाधार है। वेदना का प्रसार करेंगे तो भारतेंदु हरिश्चंद्र के समान रोने लगेंगे, ’आओ मिल रोहहु भारत भाई।’ अंधेर नगरी लिखेंगे तो चौपट राजा के बखान का आनंद लेंगे। मैं समझता हूं कि सतचित्त वेदना का आनंद लेना ही व्यंग्य है। इसीलिए मैं आनंद में हूं, क्योंकि व्यंग्य पर बड़ी आनंदकारी बातें सुनी हैं। व्यंग्य वेदना ही नहीं है, एक चेतना है। व्यंग्य एक विधा ही नहीं है, अभिव्यक्ति की सुविधा है। शासकों की समझ में आ जाए तो यदा-कदा दुविधा दुविधोत्पादक भी हो जाती है। व्यंग्य कोई रस नहीं है। एक कद्दूकस है। व्यंग्य कद्दू भी नहीं है। करेला है। नीम चढ़ा नहीं है। हकीमपढ़ा है। दान नहीं करता। निदान करता है। रसखान की तरह प्रेममार्गी नहीं है। सतचित्त के बखान का खानसामा है। व्यंग्य कोसने को परोसता है। और आप तो जानते हैं चचा कि हमारे देश में मुफ्त में परोसा हुआ माल आनंद देता है। व्यंग्य मुफ्त है तभी तो लुत्फ है। जिस पर करो वो बहरे होने का ढोंग करता है। गहरा हो तो कान फाड़ू हो जाता है। सुनोगे कैसे नहीं बच्चू! लोकतंत्र कहते हो तो सुनना पड़ेगा। व्यंग्य का आनंद ले लिया तो सिर धुन्ना पड़ेगा। मैं सिर धुन्ने का आनंद ले रहा हूं चचा। व्यंग्य के चाहने वालो इस आनंद के पैर छूओ।

     

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