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  • उत्तर मिल गया

    –चौं  रे चम्पू! कहां की भीड़ सबते जादा परेसान दीखै?

    –सोचने दो चचा! कुंभ की भीड़ को सबसे ज़्यादा परेशान इसलिए नहीं कहूंगा, क्योंकि वहां पापों से मुक्ति का आश्वस्ति-भाव रहता है मंदिर,मस्जिद, गुरुद्वारे और गिरजाघर इसलिए नहीं, क्योंकि धर्मपरायण भारतीयों को अपने-अपने आराध्य पर भरोसा है। अस्पताल इसलिए नहींक्योंकि चिकित्सा के क्षेत्र में अकल्पनीय विकास हुआ है। आदमी ग़रीब न हो तो आसानी से मरने नहीं दिया जाता।

    –गरीब की मौत, वाके ताईं सकून भौत!

    —सुनिए सुनिए! उत्तर मिल गया! सबसे ज़्यादा परेशान भीड़ कोर्ट कचहरी में दिखाई देती है। इतनी परेशान आत्माएं एक साथ कहीं और नहीं होतीं।दिल के खोट वाले दलाल। काले कोट वाले वकील। करहाते हुए गवाह। न्याय की गुहार लगाते हुए ग़रीब। ऐसे-ऐसे लड़ने वाले, जो पहले रहे बेहद क़रीब। रिश्ते बिना मुस्कान के। मामले ज़र, जोरू, ज़मीन, मकान और दुकान के। मुंसिफ़, मसाइलों से परेशान! जज, गगनचुम्बी फ़ाइलों से परेशान। बयान बाज़ नहीं आते हेराफेरी से। न्याय मिलता है मगर देरी से। यहां कोई भी तो किसी का नहीं है। झगड़े मिटाना ही तो सीखा नहीं है। ये मंडी है मृतप्राय मुंडों की। यहां गुपचुप गोपन गलियां हैं गुंडों की। शरीफ़ यहां शरीफ़े की तरह बिखर जाता है। कड़वाहट ही कड़वाहट है चचा,मिठास का स्वाद नहीं आता है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस टी.एस.ठाकुर तो प्रधानमंत्री के सामने लगभग रो ही पड़े थे।

    –चौं रो परे?

    –बोले, आप सारी ज़िम्मेदारी न्यायपालिका पर नहीं डाल सकते। दस लाख लोगों पर सिर्फ़ दस जज। सत्तासी में कहा था पचास करा देंगे। जजपरेशान हैं तनाव के मारे। क़ानून ही असहाय है क़ानून के सहारे।

    –तौ इलाज का ऐ?

    –इलाज ये है कि मुकदमे लड़ो ही मत। थोड़ा झुककर, थोड़ा तनकर, खोटे लोगों के आगे छोटे बन जाओ। अहंकार मत लाओ। तुम भी अपनी आंखेंनम करो! जज भले ही न बढ़ें, मुक़दमे कम करो! मेरे मित्र कैलाश गौतम ने लिखा था– भले डांट घर में तू बीवी की खाना, भले जैसे-तैसे गिरस्तीचलाना, भले जाके जंगल में धूनी रमाना, मगर मेरे बेटे कचहरी न जाना! कचहरी न जाना!!

    wonderful comments!