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    —चौं रे चम्पू! और सुना का सुनायगौ?

     

    —सुनाऊं क्या? मैं स्वयं किशोरी अमोनकर नाम के उत्तुंग शिखर से आती हुई गूंज में डूबा हूं। ‘सहेला रे…’ या ‘उड़ जा रे कागा…’। गायन-गूंज दिल में आकर बैठ गई है चचा!

     

    —सुनी ऐ कै बड़ी नकचढ़ी हतीं।

     

    —नारियल की तरह बाहर से कठोर थीं, अंदर से बहुत कोमल, ऐसा बांसुरीवादक चौरसिया जी कहते हैं। वे कोमल-तीव्र सुरों के बीच असंख्य श्रुतियों की तितलियों में रहती थीं। दरअसल, मुझे शास्त्रीय संगीत का चस्का, मित्र मुकेश गर्ग और शादी से एक बरस पहले आपकी बहूरानी ने लगाया था। उन दिनों वे पत्र-पत्रिकाओं में संगीत पर यदाकदा लिखती थीं। परसों रात संयोग से मैं कमानी सभागार के उसी ग्रीनरूम में था, जिसमें बयालीस साल पहले किशोरी जी से भेंट हुई थी। सीन डिज़ॉल्व हो रहा है। वही ग्रीनरूम, कुर्सियां नहीं, बड़ा-सा गद्दा है, जिस पर सफ़ेद चांदनी है। कार्यक्रम के बाद हम दोनों उनका साक्षात्कार लेने की फिराक़ में ग्रीन रूम में आते हैं। वे प्रेमी-युगल को अपने पास बिठाती हैं। बागेश्री रागदारी के बारे में कुछ पूछ रही हैं, मैं उतावला अज्ञानी बीच में बोल उठता हूं, ‘कौन सी क्षमता है, जिससे आप सबको मंत्रविद्ध कर देती हैं?’ वे मेरी ओर देखती हैं, चेहरे पर कठोरता लाते हुए कहती हैं, ‘बस फिर कभी!’ ये अचानक क्या हुआ! हम अपमानित-से होकर निकल आते हैं। सीन समाप्त चचा! लेकिन, उनकी कला के प्रति सम्मान निरंतर बढ़ता रहा। एक बार श्रोताओं में कोई पान खा रहा था। उन्होंने कुपित होकर कहा, ‘यह मुजरा नहीं है, बाहर निकल जाइए।’ सांगली में आयोजकों से कहा, ‘सामने का पेड़ हटवाइए, तभी गाऊंगी।’ आयोजकों ने थान के थान मंगवाकर जब तक पेड़ ढंक नहीं दिया, उन्होंने गाना नहीं सुनाया। उनकी अपरिमित क्षमताएं जानने के बाद बयालीस साल बाद मुझे अपने प्रश्न और अपने घाव के लिए उत्तर मिल चुके हैं। वे कहती हैं, ‘मैं मनोरंजन नहीं करती, श्रोताओं को आत्मरंजन कराती हूं, इसीलिए मेरे गायन से बंधे रहते हैं।’ पंछी उड़ गया, चचा!

     

    —तेरे घाव कौ का उत्तर निकरौ?

     

    —मेरे बोलते ही उन्हें पता चल गया कि ये बीड़ी पी कर आया है।

     

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