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  • टिकली जिए बापू   
  • टिकली जिए बापू   

     

    —चौं रे चम्पू! टिकली जिए बापू कौन ऐं?

     

    —चचा, ‘प’ पर बड़े ऊ की मात्रा नहीं, छोटे उ की है। बापू नहीं बापु। इसके अलावा एक ग़लती और की आपने। तीन शब्द नहीं हैं, एक ही शब्द है, ‘टिकलीजिएबापु’। ये दूसरी बात है कि ‘टिकलीजिएबापु’ की सतरंगी आभाएं हैं। इस शब्द का निर्माण कल आपकी ही बगीची के युवा पहलवानों ने किया है। यह एक ऐसा सम्प्रदाय है, जिसके सदस्यों में परस्पर कोई संबंध नहीं है, फिर भी उनकी संख्या निरंतर बढ़ी है। कल चौधरी समर सिंह आए थे न बगीची पर।

     

    —अरे समझि गयौ। एक पारटी में टिकै ई नायं पट्ठा। बगीची के छोरन्नै, ‘टिक लीजिए बापू’ कही होयगी।

     

    —आपने फिर बड़े ऊ की मात्रा लगा दी और एक के तीन शब्द बना दिए! लेकिन इसमें शक नहीं कि आप इस शब्द के आधे अर्थ तक तो पहुंच गए। मैंने बताया था न कि ‘टिकलीजिएबापु’ शब्द की सतरंगी आभाएं हैं। आप आधे अर्थ तक पहुंचे थे, पूरा अर्थ है, ‘टिकिट कट ली जिनकी एक बार पुन:’। टिकट बटीं, फिर कटीं, फिर बटीं, फिर कटीं, फिर से कोई सूची आ गई लटपटी। ‘टिकलीजिएबापु’ओं के समर्थकों की फ़ौज लगी रही चंवर डुलाने में और ‘टिकलीजिएबापु’ओं की नैया घूमती रही भंवर-मुहाने में। हर पार्टी में इन ‘टिकलीजिएबापु’ओं की भारी संख्या है। चौधरी समर सिंह लगभग विक्षिप्त होकर बड़बड़ा रहे थे। इस बार मेरी जीत पक्की थी। चार साल से जीतोड़ काम किया है और इन्होंने मुझे चार बार टिकिट दे देकर काटी है। वंशवाद के विरोधी दंशवादी हो गए हैं। वफ़ादारी का सबक सिखाने वाले अपघाती हो गए हैं। मैंने कहा, समर सिंह जी, जिन हिंदीभाषी प्रांतों में चुनाव होने वाले हैं, उन प्रांतों से छब्बीस जनवरी की परेड के लिए एक भी झांकी नहीं आई है। ऐसा करिए ‘टिकलीजिएबापु’ओं को प्रांतवार संगठित करके छब्बीस जनवरी की परेड के लिए नई झांकियां बनवाइए। जिन्होंने झांसा दिया, उन्हें दिखलाइए। अफ़सोस की बात ये है चचा कि वे तो ‘टिकलीजिएबापु’ का मतलब भी नहीं जानते।

     

    —समर सिंग कूं अमर सिंग के संग लगाय दै लल्लू! तू ऐ छोटे उ ते उ….!!

     

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