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  • पीठ पर पीर का पर्वत
  • पीठ पर पीर का पर्वत

    —चौं रे चंपू! दुस्यंत कुमार की बात पूरी कर, तू मिल्यौ ओ उन्ते?

    —काश, उनसे मिलना हुआ होता। वैसे, किसी भी रचनाकार से मिलना, उसके साहित्य से मिलकर हो जाता है। उस दिन उनकी पुत्रवधू दीपिका ने सही कहा कि जितने ज़रूरी वे अपने जीवनकाल में थे, उससे ज़्यादा महत्वपूर्ण वे आज भी हैं। मैंने कहा इसलिए हैं क्योंकि उन्होंने ‘सूर्य का स्वागत’ किया था। वे ‘आवाज़ों के घेरे’ में रहे थे। वे ‘जलते हुए वन के वसंत’ देखना चाहते थे। ‘साए की धूप’ में उन्होंने अपने कंठ को विषपाई बना लिया था। वे धूप भी बने, और साया भी। वे एक बेचैनी जीकर आपको सुकून और जुनून और रास्ता और वास्ता और धूप और साया देने के लिए धरती पर आए थे।

    —भौत सारे ‘और’ लगाय दए!

    —हां चचा, और मैं समझता हूं कि बहुत कम उम्र में सार्थक काम कर जाने वाले भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के साथ उनका नाम लिया जा सकता है। भारतेन्दु अठारह सौ पचास में आए और पिचासी में चले गए। आप उन्नीस सौ तेतीस में आए और पिचहत्तर में चले गए। बयालीस की उम्र कोई उम्र नहीं है। जब देश में जब इमरजेंसी का अंधेरा-सा आया था, वे बहुत बेचैन थे। और उस छोटे से काल-खंड में उन्होंने जो लिखा, अद्भुत है। वे आज भी जीवित होते, लेकिन आदमी जब ज़माने के दुखों को दिल से लगा बैठता है तो रोग बहाना बन जाते हैं।

    —जे बात तौ सई ऐ तेरी।

    —उन्होंने अनेक विधाओं में लिखा, लेकिन प्रसिद्ध हुए ग़ज़ल से। आप तो जानते हैं कि उर्दू शायरी में घूम-फिर कर बात मौहब्बत पर आ जाती है। दुष्यंत कुमार को बहुत मानने वाले अदम गोंडवी ने कहा था, ‘ज़ुल्फ़, अंगड़ाई, तबस्सुम, चांद, आईना, गुलाब; भुखमरी के मोर्चे पर ढल गया इनका शबाब।’ सत्तर के दशक में दुष्यंत के ज़रिए जो ग़ज़ल हिंदी में आई उसने शायरी का मिजाज़ बदल दिया।

    —का बदलाव आयौ?

    —दुष्यंत की ग़ज़लों से ग़ुज़रिए न। उन्होंने कहा, ‘मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूं, वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूं।’ ग़ज़ल-बिछावन उनकी साथिन थी, आकाश-कंबल उनके साथ रहता था। किसी सामंती दरबार के कालीन-चंदोवे से उनकी ग़ज़ल का जुड़ाव नहीं था। ‘आपके क़ालीन देखेंगे किसी दिन, इस समय तो पांव कीचड़ में सने हैं।’ उनकी ग़ज़ल जन-मन की हलचलों में शिरकत के लिए  इंडिया गेट पर बिछकर राजपथ को देखती थी। उसे जानने के लिए आपको उनके समय की बदलाव-प्रक्रिया को देखना पड़ेगा। ‘तू किसी रेल सी गुजरती है, मैं किसी पुल सा थरथराता हूं।’ इस शेर में ‘तू’ कौन है यह सोचना पड़ेगा। यह थरथरा देने वाले यथार्थ का बिम्ब है। उर्दू ग़ज़ल के लिए यह एक नई मुठभेड़ थी। निदा फ़ाज़ली कहते थे कि दुष्यंत ने नौजवानों के ग़ुस्से को अल्फ़ाज़ दिए। कोई व्यक्ति ऐसे ही संसद में बार-बार उद्धृत नहीं होता चचा!

    —एक सेर मोऊ ऐ याद ऐ, ‘है गई ऐ पीर परबत सी पिघलनी चाहिए, या हिमालय ते कोई गंगा निकरनी चाहिए।‘

    —’ते’ नहीं ‘से’ चचा! ‘इस हिमालय से’! पीर का पर्वत पीठ पर ढोकर चलते थे वे। तभी कहते थे, ‘ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा। मैं सजदे में नहीं था, आपको धोखा हुआ होगा।’ आज के अख़बार पढ़ लीजिए और उनका कोई भी शेर दोहराइए, लगेगा जैसे अभी के लिए लिखा है। ‘हर तरफ ऐतराज़ होता है, मैं अगर रौशनी में आता हूं।’ ‘यहां तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियां, हमें मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा।’ जो मशाल दुष्यंत नौजवानों को थमाकर गए थे, उसे उनसे कोई छीन नहीं सकता। आप हर शेर पर वाह-वाह कह उठते हैं, और आपको पता नहीं लगता कि ये वाह-वाह आप क्यों कर रहे हैं। दुष्यंत कवि का नहीं, आज के और भविष्य के आन्दोलनों का नाम है। उनके शब्दों की दुनिया में नौजवान एकत्रित हो जाते हैं। कल महिला दिवस के एक कार्यक्रम में एक युवा महिला ने आसमान में छेद करने की चुनौती वाला उनका शेर सुनाया। और भी हैं जो सुना रहे हैं, ‘सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।’ गंगा निकलनी चाहिए, बुनियाद हिलनी चाहिए, वे शायरी में ‘चाहिए सम्प्रदाय’ के शायर थे।

    wonderful comments!