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  • पपड़ियां और चूना

    —चौं रे चम्पू! मुंबई में है गयौ सम्मान?

    —हां, चचा। बड़े भाई सरीखे मित्र स्व. हुल्लड़ मुरादाबादी की स्मृति में ‘कवितालय फाउंडेशन’ ने यह ‘शिखर सम्मान’ शुरू किया है। पहला मुझे ही दे दिया। नवनीत हुल्लड़ और मेरे पुराने साहित्य-प्रेमी मित्र संजय निरुपम आयोजक थे। इस बार की यात्रा में अमिताभ बच्चन जी से भी भेंट हुई।

    —वाह भई वाह!

    —हां चचा! व्यस्त थे, लेकिन महबूब स्टूडियो में शाम चार बजे बुला लिया। पहुंच गए जी सैट पर। टीवी मॉनीटर के पास हमें प्रेमपूर्वक बिठा दिया गया। अमित जी एक मध्यवर्गीय परिवार के कमरे में सूट पहन कर सोफे पर बैठे हुए शॉट के लिए तैयार थे। ऐक्शन के साथ ही कमरा हिला, दीवारों से चूना गिरा और वे धूल-धूसरित हो गए। निर्देशक ने कट कहने के बाद कहा, ऐक्सिलैंट। टीम के बीस-पच्चीस लोगों ने तालियां बजाईं। पहला टेक ही ओके था। फिर अगले शॉट्स के लिए व्यवस्थाएं बदली गईं। वे स्क्रिप्ट देखते रहे। कपड़ों और चेहरे से चूना और पपड़ियां हटाईं गईं, फिर लगाई गईं। वे अपने काम में तल्लीन थे। हमें भी कोई हड़बड़ी नहीं थी। सम्मान समारोह में सात बजे तक पहुंचना था। लगभग पौन घंटे में तो सारा काम ही सम्पन्न हो गया। सैट से वे नीचे उतरे तो लोग उनके साथ फोटो खिंचाने लगे। उनकी निगाहें मुझे खोज रही थीं। उन्होंने दूर से एक उंगली दिखाई, जिसका आशय था कि बस एक मिनट और। वे आए, कुछ काम की बातें हुईं। शूटिंग के दौरान मैंने जो चंद पंक्तियां लिख मारी थीं, उन्हें थमा दीं। पढ़कर वे मुस्कुराए।

    –का लिखौ तैनैं?

    —कागज तो उन्होंने ही रख लिया, पर पंक्तियां याद हैं, ‘हिलती गिरती दीवारों से खिरता चूना, अच्छा-ख़ासा गृह-स्वामी बन गया नमूना। दर्शक नहीं जान पाते हैं इतना लेकिन, कलाकार ने कितना कष्ट उठाया उस दिन! सब कुछ सहता रहा बनाई हुई धाक में, कितना चूना चला गया था वहां नाक में।’ मान लिया पपड़ियां काग़ज़ की बनी थीं और वह चूना नहीं पाउडर रहा होगा, लेकिन कष्ट तो भोगा न अभिनेता ने। अनावश्यक रसायन गए सांस के साथ।

    —’पा’ फिलम में तौ उन्नैं कमाल कद्दियौ हतो।

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