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    न हम जीते न तुम हारे

     

    —चौं रे चम्पू! पाकिस्तान किरकिट में हार गयौ, तैनैं जस्न मनायौ कै नायं?

    —नहीं! मैंने कोई जश्न नहीं मनाया चचा! मैंने तो पाकिस्तान के जीतने का जश्न मनाया।

    —पाकिस्तान कौन से खेल में जीतौ भला?

    —चचा, पाकिस्तान इस बार दिल के खेल में जीत गया। दिल जीत लिया उसने। उस चौक का नाम भगत सिंह चौक रख दिया जहां सरदार भगत सिंह को फांसीलगी थी। देखिए, पैंसठ साल से बातचीत चल रही हैं। समझौता वार्ताएं तिल भर परिणाम नहीं देतीं। यह एक तिलमिलाया हुआ सिलसिला है। हमारे पत्रकार, नेता,कलाकार, गायक, कवि, शायर, अमन की मोमबत्ती और हवन की होमबत्ती जलाने जाते रहते हैं। विभाजन के गर्द-गुबार के बाद, दिलों में पड़ी दरार के बाद,मौहब्बतनामे के हर इंकार के बाद, तीन-तीन युद्धों की टंकार के बाद, सन बहत्तर के शिमला समझौते के करार के बाद, सन निन्यानवै के लाहौर घोषणा-पत्र की मनुहार के बाद, कारगिल युद्ध के सैनिक-संहार के बाद और आगरा की शिखर वार्ताओं की असफलता के विस्तार बाद भी बातचीत लगातार जारी रही हैं। इस्लामाबाद और दिल्ली से संयुक्त वक्तव्य प्रसारित और प्रचारित किए जाते रहे हैं। वैर-भाव दूर करने के लिए शांति और सौमनस्य के वातावरण को बनानेकी हर सम्भव कोशिश की जाती रही है।

    —सो तौ है!

    —खूबसूरत विदेश मंत्री आती रही हैं। हमारे खूबसूरत विचार वहां जाते रहे हैं, लेकिन अतीत के अनुभवों ने कटुता के अलावा क्या मिला? नई पीढ़ी में कैसे वहसद्भाव आए जो आज इंटरनेट के युग में इतिहास को एक पल में छान लेती है और समझ जाती है कि आतंकवाद का अड्डा है कहां है। कौन शांतिप्रिय है औरकौन अशांति का दस्तरख़ान बिछाता है। पूरी दुनिया की समझ में आता है कि इस मौहब्बत को बढ़ाने की इकतरफा ज़िम्मेदारी हमीं ने निभाई है। उधर से भी तोकुछ होना चाहिए। अट्ठाइस तारीख को शहीद भगत सिंह का जन्मदिन था। इस बार नामकरण से दिल तो वे जीत चुके हैं। तीस तारीख के मैच में वे हार गए,इससे क्या!

    —बड़े अच्छे बिचार ऐं लल्ला तेरे!

    —विचार ही तो महत्वपूर्ण होते हैं चचा। सरदार भगत सिंह नहीं रहे, लेकिन उन्होंने जो कहा था उसे हमारे देश का बच्चा-बच्चा जानता है। ब्रिटिश हुकूमत कोहिन्दुस्तानी जनभावनाओं के प्रति जागरूक करने के लिए भगत सिंह ने असेम्बली में बम फेंका था और जो पर्चे हवा में लहराए थे उन पर लिखा था, किसीआदमी को मारा जा सकता है, लेकिन विचार को नहीं। चचा, आपने मेरे विचार को अच्छा विचार बताया है तो यह विचार भी मर नहीं सकता कि दोस्ती ही निदानहै। असली दुश्मन कौन हैं यह मिलकर पहचानना होगा।

    —इत्ती सदबुद्धि कैसै आई?

    —आई इसलिए होगी क्योंकि साम्राज्यवाद आज नए-नए रूपों में फैल रहा है। सरदार भगत सिंह अकेले भारत के लिए नहीं, पूरे एशिया के लिए महत्वपूर्ण हैं। वे साम्राज्यवादी औपनिवेशिक दमन के विरुद्ध एक आवाज़, एक विचार बनकर उभरे थे। अब यदि शादमान चौक का नाम भगत सिंह चौक हुआ है तो निश्चित रूपसे मुझे लगता है कि क्रिकेट में निरंतर आठ बार हराने के बाद वे हमसे सौमनस्य में बराबर की टक्कर पर आ रहे हैं। न तुम जीते, न हम जीते, न तुम हारे, नहम हारे।

    —वहां कोई आपत्ती नायं भई?

    —कोई एक चौधरी रहमान अली साहब थे वहां। नेक इंसान रहे होंगे। उनके नाम पर उस चौक का नामकरण किए जाने का भी प्रस्ताव था। जैसे हमारे यहां भीबहुत सारे चौक हैं, जिनके नाम अगल-बगल के नेताओं के पिताओं के नाम पर रख दिए गए हैं, लेकिन भला हो निर्णयकर्ताओं का जिन्होंने अट्ठाईस सितम्बरको पाकिस्तान लेबर पार्टी समेत अनेक संगठनों की आवाज़ को सुना और स्वीकार किया कि अब ये शादमान चौक नहीं भगत सिंह चौक कहलाएगा। फैसलाबादजिले में उनके जन्मस्थान पर म्यूजियम बनाने का फैसला भी दोस्ती को आबाद करेगा। लायलपुर पाकिस्तान की लॉयल्टी दिखाएगा अगर वे इस महान शहीद सेमिलने आने वाले जज़्बात का वीज़ा बनाने में कोताही नहीं करेंगे। अरे चचा! उसी से भारत उपमहाद्वीप का भला होगा।

     

    wonderful comments!

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