मुखपृष्ठ>
  • चौं रे चम्पू
  • >
  • मन तो करता है
  • मन तो करता है

    —चौं रे चम्पू! होरी में तो अभी टैम ऐ, तेरे बारन में रंग-गुलाल कौन्नै डाद्दियौ?

    —गुलाल तो बस बालों में रह गया है. कल देखते तो सर्वांग गुलालित्य था। होली के लिए विभिन्न चैनल इन दिनों कार्यक्रम बना रही हैं। होली का पूर्वाभ्यास चल रहा है। एक चैनल ने ‘रंग-रसिया’ कार्यक्रम के लिए मुझे भी बुलाया। गीत-संगीत, नृत्य, रास, कविता के सामूहिक रस-वर्षण में चचा, आनंद आया।

    —कहां भयौ ओ?

    —कार्यक्रम की भूमि थी वृन्दावन। स्थानीय ब्रजवासी कलाकारों का जमावड़ा था। संचालिका थीं श्वेता। साथ में कुमार विश्वास, खांटी ब्रजवासी अंगरखा-धोती पहने हुए। हेमा मालिनी मेरे पहुंचने से पहले निकल चुकी थीं। मुम्बई से शैलेश लोढा को बुलाया हुआ था। अगर अच्छा सम्पादन हो जाए, कार्यक्रम धांसू बनेगा। शैलेश और कुमार अच्छे गायक तो हैं ही, ठीक-ठाक थिरकना भी जानते हैं। मैंने भी ब्रज स्टाइल के दो-चार ठुमके लगा दिए। लेकिन, कार्यक्रम की जान थीं मालिनी अवस्थी।

    —भौत मलूक ऐ और अच्छौ गावै।

    —हां! बहुत स्नेह मानती हैं और आदर देती हैं। जब से उन्हें सुना है, तब से उनका मुरीद हूं। कभी किसी चैनल पर मुलाक़ात हो जाती है, कभी किसी मंच पर। उनके घर भी गया था एक बार।   उनका पूरा परिवार अतिथि-वत्सल है। हिंदी अकादमी के लिए हिन्दी को लेकर छह छोटी फिल्में बनवाई थीं, तब उनसे लम्बी भेंट हुई और मुझे यह देखकर बेहद खुशी हुई कि वे लोक-तत्वों की आत्मा को गहराई से जानती हैं। अनायास उन्होंने एक ऐसा जुमला बोला जो मेरे अंतर्मन में समा गया।

    —का कही उन्नै?

    —उन्होंने कहा, ‘हमारी हिंदी का दिल लोकगीतों में धड़कता है’। चचा, इन दिनों वे ऐसी एकमात्र गायिका हैं जिनमें कला की संवेदनशीलता तो है ही कला का शास्त्रीय ज्ञान भी भरपूर है और ऊर्जा भरपूर से ज़्यादा है। उन्हें आमतौर से अवधी, भोजपुरी और बुन्देलखंडी की गायिका कहा जाता है, लेकिन कल की शूटिंग में, उन्होंने ब्रजभाषा में भी जो गीत गाए और जो रंग-रसिया-रंग बिखराए, वे अद्भुत थे। मैंने पाया कि उनके अन्दर सिनेमा का भी गहरा ज्ञान है। वे लाइट और साउंड की टैक्नॉलॉजी से परिचित हैं। कैमरे कहां-कहां लगे हैं, यह देखकर पलांश में अपनी ब्लॉकिंग कर लेती हैं। बहुत जल्दी अपरिचित संगतकारों को इतना सहज कर देती हैं कि वे पूर्वाभ्यास के बिना, लय, ताल और सुर में आ जाते हैं।

    —संगत्कारन ऊ अच्छे रहे हुंगे। और कौन हते?

    —मथुरा-वृन्दावन के रासधारी कलाकार थे जो हर प्रस्तुति के लिए नयनाभिराम पूर्वपीठिका बना रहे थे। जयपुर मंदिर का खुला प्रांगण था। लेकिन….!

    —लेकिन, काए बात की?

    —लेकिन, ये कि चचा होली के दिन अधिकांश चैनलों पर कैमरे के आगे गुलाल उड़ेंगे, पिचकारी मारी जाएंगी, नृत्य होंगे, गीत होंगे लेकिन….!

    —चुप्प चौं है गयौ? बोल, लेकिन के अगाड़ी बोल!

    —दूरदर्शन पर आठवें दशक से मेरा और मंच के कवियों का व्यापक स्तर पर लोकप्रिय होना प्रारम्भ हुआ था और होली के अवसर पर कविसम्मेलन हुआ करते थे। कभी दो घंटे, कभी ढाई घंटे। आमंत्रित श्रोताओं के सामने कभी स्टूडियो में, कभी किसी सभागार में कराए जाते थे। दर्जन दो दर्जन कवि रहते थे। एक चैनल का आधिपत्य था। विज्ञापनों का व्यवधान नहीं रहता था। तो चचा! कविसम्मेलन सर्वाधिक पसंद किए जाने वाला एक कार्यक्रम होता था, जो सालभर के लिए श्रोताओं को कविताएं दे जाता था।

    —फिर का भयौ?

    —हास्य कविताओं की मांग बढ़ी। दूरदर्शन ने महीने के हर दूसरे मंगलवार को एक कार्यक्रम प्रारंभ किया ‘क़हक़हे’, जिसमें मेरी प्रमुख भूमिका रहती थी। फिर दूरदर्शन पर स्पौंसर्ड कार्यक्रमों का युग आया, कविता के लिए जगह सिकुड़ गई। कथा-धारावाहिकों की बाढ़ आई तो दूरदर्शन ने नया चैनल डीडी-2 चलाया। नव्वै के बाद प्राइवेट चैनल आने लगे, हास्य तो रहा लेकिन कविता फिर नेपथ्य में चली गई। चैनल्स को टीआरपी लानी है। अब छोटे-छोटे टुकड़ों में रस-वर्षा तो होती है, पर कविता अपने रस की सघनता लेकर श्रोताओं तक नहीं जा पाती। ‘सब टीवी’ की चाहत पर दस साल पहले मैंने ‘वाह-वाह’ नामक एक कार्यक्रम दिल्ली से शुरू किया था। टीवी पर कविता की जैसे वापसी हुई थी। साल भर तक हर दिन कविता। मुम्बई जाकर उस कार्यक्रम में ग्लैमर ज़्यादा हो गया। नई पीढी को हिन्दी की स्वस्थ वाचिक परम्परा से परिचित कराने और नए कवियों को प्रोत्साहित करने का काम अभी बाकी है।

    —तौ तू कर!

    —मन तो करता है, अमित बंसल प्रोत्साहित भी कर रहे हैं, पर देखिए!

    wonderful comments!