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    मैथुन आहार निद्रा भयम् च

    —चौं रे चम्पू! जोहान्सबर्ग हिंदी सम्मेलन में का चरचा भईं? गांधी जी कौ कित्तौ चरखा चलायौ?

    —अरे, छोड़िए वहां की चर्चा। विशुद्ध सरकारी कार्यक्रमों से बहुत उम्मीदें नहीं लगाई जानी चाहिए। निर्विघ्न हो गया। अच्छी रस्म-निभाई हो गई, लेकिन आपने चर्चाऔर चर्खा एक साथ कहा तो मुझे सर्वेश्वर दयाल सक्सेना याद आ गए। दिनमान में उनका एक स्थाई स्तम्भ आया करता था ’चरचे और चरखे’। मेरी उनसे गहरीछनती थी। मुझे इसलिए भाते थे कि उनकी कविताएं समझ में आती थीं। सम्प्रेषणीयता उनकी कविता की ताक़त थी। एक बड़ी ताक़त यह भी थी कि वे सिर्फबौद्धिकता को नहीं झकझोरते थे, हृदय पर भी प्रभाव डालते थे।

    —चल कोई कबता ई सुनाय दै उनकी।

    —एक छोटी सी कविता है, ‘जब भी भूख से लड़ने कोई खड़ा हो जाता है, सुन्दर दिखने लगता है। झपटता बाज़, फन उठाए सांप, दो पैरों पर खड़ी, कांटों से नन्हीं पत्तियां खाती बकरी, दबे पांव झाड़ियों में चलता चीता, डाल पर उलटा लटक फल कुतरता तोता! या इन सब की जगह आदमी होता! जब भी भूख से लड़ने कोई खड़ाहो जाता है, सुन्दर दिखने लगता है।’

    —जामैं का बात भई?

    —कमाल कर दिया चचा! मेरे हिसाब से ‘भूख’ नाम की यह कविता एक नए सौन्दर्यशास्त्र का गठन करती है। तृप्ति में सौन्दर्य नहीं है। अतृप्ति जब तृप्ति की ओर यात्राकरने के लिए एकाग्र होती है, तब व्यक्तित्व में अद्भुत सौन्दर्य-सृष्टि होती है। किसी भी प्राणी का तन या मन, जब किसी भी लक्ष्य की प्राप्तिकामना में, अपनी सम्पूर्णऐन्द्रिक एकाग्रता के साथ लक्ष्यभेदन कर रहा होता है, तब सुन्दर दिखता है।

    —वाह रे रामचन्दर सुकुल के भतीजा!

    —भतीजा तो तुम्हारा हूं, पर यह कविता बताती है कि जब प्राणी को भूख लगती है तब उसे और कुछ और नहीं सूझता। प्रकृति ने उसे जितनी क्षमताएं दी हैं वह उनसबका इस्तेमाल करता है। ये क्षमताएं प्रकृति से लड़ते-लड़ते ही उसने अपने अन्दर उत्पन्न की हैं। देखा है न, दबे पांव झाड़ियों में शिकार की ओर बिल्लियों, चीतोंया शेरनियों का चलना? उस चाल में ध्वनिहीनता प्रकृति ने बख़्शी है। एक-एक क़दम में ग़ज़ब की सावधानी! सांप की सशक्त मांसपेशियां उसे हवा में झुला सकती हैं और वह निर्द्वन्द्व-निर्ध्वनि अपने आहार के निकट सहजता से जा सकता है। देखी है कांटों से न उलझते हुए पाती खाती बकरी की सुन्दर लम्बाई। उसी सौन्दर्य केसाथ बाज के पंखों को वह स्थिरता मिली है कि आकाश से नीचे झपट्टा मारते समय वह हवा को भी स्तब्ध कर दे और एक झटके में अपने शिकार को दबोच ले।गुरुत्वाकर्षण का नियम तोते पर उस समय काम नहीं करता है जब वह फल खाने के लिए डाल पर उल्टा लटक जाता है। वह गिर सकता था, लेकिन उसके पंजों कोकुदरत ने इतनी ताक़त प्रदान की कि वह उल्टा लटक सकता है।

    —और आदमी रे?

    —आदमी के पास इतनी सारी क्षमताएं और होतीं तो पता नहीं वह क्या करता? वह न तो उल्टा लटक सकता है, न सांप की तरह बहुत आगे तक अपने आपको लासकता है। उस पर गुरुत्वाकर्षण का नियम भी काम करता है। अन्य जीवधारियों के लिए, ‘आहार, निद्रा, भय, मैथुनम् च’ अपनी क्रमिकता में हैं। मैथुन को अन्यजीवधारी प्रजनन और संतानोत्पत्ति का एक छोटा सा काम मानते हैं। मनुष्य के लिए यह क्रम हो जाता है, ‘मैथुन, आहार, निद्रा, भयम् च’! भूखा मनुष्य आकृष्ट नहींकर पाता, यही इस कविता का व्यंग्य है। भूखा आदमी अगर सुन्दर लगने लगे तो जिस आदमी को वह सुन्दर लगेगा, वह आदमी हरगिज़ सुन्दर नहीं हो सकता। इसव्यंग्य तक पहुंचना, कठिन है। यही इस कविता की जटिलता है कि जब भी भूख से लड़ने कोई खड़ा हो जाता है, सुन्दर दिखने लगता है। भूख से लड़ने के लिएआदमी अकेला खड़ा नहीं होता, संगठन की महत्ता और आन्दोलनधर्मी चेतना का तत्व भी इस कविता में छिपा हुआ है।

    —जे बात तौ मानी!

    —हमारा पूरा रीतिधर्मी सौन्दर्यशास्त्र, मनुष्य को श्रृंगारिकता में सुन्दर दिखाता है। उसकी सारी ऐन्द्रिक एकाग्रता के पल वहीं हैं। पेट की भूख से तो उसकी लड़ाईप्रकृति ने कब की ख़त्म कर दी! यह कविता पूरे साहित्य और पूरी परम्परा को ध्वस्त करने वाली है। सुनने का धीरज हो तो अभी ढाई घंटे का प्रवचन दे सकता हूं,चचा!

     

    wonderful comments!

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