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    क्या बताऊं अपनी कमाई

    —चौं रे चम्पू! आजकल्ल तेरी कमाई कौ साधन का ऐ रे?

    —चचा, यह एक ऐसा दार्शनिक प्रश्न है जिसका क्या उत्तर दूं आपको! जो चीज़ दर्शन में, यानी,निकटस्थ लोगों के देखने में आती है, वह तो कही नहीं जाती और जो है ही नहीं, उसको ये दार्शनिक लोग इतना बढ़ा-चढ़ा कर बताने लगते हैं कि मुझे ख़ुद हैरानी होती है। नौकरी छोड़करपिछले आठ साल से तुम्हारा ये हिन्दी-सपूत चम्पू भाषा, संस्कृति, साहित्य, और प्रौद्योगिकी केइलाक़ों में भाग रहा है, दौड़ रहा है। ज़्यादा भाग-दौड़ करी तो दार्शनिक सोचने लगे कि ज़रूर कमाई का कोई गोरख-धंधा है, वरना क्या ये अंधा है कि व्यर्थ वक़्त ख़र्च कर रहा है। कमाई होती थी तब,जब पढाता था, तनख़्वाह मिलती थी। कविसम्मेलनों और फ़िल्मों की भी कुछ आमदनी थी।स्वैच्छिक अवकाश लेने के बाद सोचा कि देशभर में यूनिकोड और देवनागरी लिपि का अभियानचलाएंगे। कुछ नाम-कमाई करेंगे और निजि उद्यम-कौशल से घर-चलाई करेंगे। जन-संचार माध्यमों से जनता से जुड़ेंगे, ज़्यादा बड़ी क्लास लेंगे। हिन्दी को आगे बढ़ाएंगे। श्रेष्ठ साहित्य को जन-जनतक पहुंचाएंगे, लेकिन तंत्र में रहकर स्वतंत्र गति मुमकिन नहीं हुई।

    —तौ तू तंत्र कौ सहयोगी बनौ ई चौं?

    —तंत्र के सहयोग के बिना भी तो विकास नहीं होता? अब एक बंधा-बंधापन महसूस होने लगा है। जो चाहते हैं वह हो नहीं पाता। योजनाएं फाइलों में बंध कर रह जाती हैं। इस दोहरे बंधेपन का फ़ायदा उठाकर दार्शनिक निरर्थक आक्रमण करने लग जाते हैं। मैं तो ख़ैर अदना सा तुम्हारा चम्पू हूं, मेरी क्या बिसात, लेकिन जो बड़े-बड़े पदों पर आसीन हैं, आज सीन ये है कि कोई भी कुछ भीकह कर चला जाता है। जो काम व्यंग्यकारों का है, वह राजनेता करने लगे हैं।

    —जैसे!

    —पहले व्यंग्य में विशेषण लगा देना एक साहित्यिक कर्म माना जा सकता था। अब व्यक्तिविशेष केनाम को तोड़ा-मरोड़ा जाने लगा। नरसिंह राव को लोग मौनी बाबा कहते थे। यह नाम का विकृतीकरण नहीं प्रवृत्तीकरण था, लेकिन अगर मन मोहन को मौन मोहन कहोगे तो ये हो जाता हैनाम का विकृतीकरण। मैं नहीं समझता कि यह कोई बहुत अच्छी बात है और वह भी ज़िम्मेदार समझे जाने वाले लोगों के मुख से। किसी भी व्यक्ति को रावण, खरदूषण, कुम्भकरण बोल दो। सोशल मीडिया की निरंकुशता के लिए कोई आचारसंहिता नहीं है। विचारशून्य गालियां तालियां बटोररही हैं। अगर सामान्यीकृत करो तब भी ठीक है, लेकिन नाम लेकर बोलो.. ऐसा तो राजनीति में अब तक प्राय: नहीं हुआ था। दूसरे को अपयश का शिकार बनाकर अपना यश बढ़ाने वाले लोग ये भूल जाते हैं कि कल अगर वे येन-केन-प्रकारेण अपने कार्यक्षेत्र की सत्ता में आ गए तो इस प्रवृत्तिपर कैसे रोक लगाएंगे। भाषा की संस्कारशीलता में हम लोग कुछ कमा नहीं रहे हैं, गंवा रहे हैं। यह देश अच्छे लोगों के कारण चल रहा है। बुरे लोग समाज में बहुत कम होते हैं। शासन-प्रशासन में भी अच्छे लोग ज़्यादा हैं, पर कुछ अच्छा करने में डरते हैं। अतिरंजना के अलंकरण से किसी को भी धूल-धूसरित करने का जो युग आया है, यह बड़ा त्रासद, भ्रामक और अराजक है।

    —अपनी कमाई बता!

    —मैंने कमाना शब्द बचपन में सुना था और उसका संदर्भ आपको भी याद होगा। तब ये फ्लश वालेशौचालयों की प्रथा नहीं थी। हमारे मौहल्ले में जो सफाई करने वाली आती थी उसे कहते थे कमानेवाली। तब विसर्जित मल-मूत्र नीचे गटरगत होकर सीधे धरती में नहीं जाते थे। सफ़ाई करने वाली आती थी और कमा कर चली जाती थी। वह बेचारी क्या कमाती होगी, दुर्गन्धयुक्त आपके उच्छिष्ट को अपने सिर पर ढोने के अलावा। आज भी बहुत सारे लोग हैं जो एक अनुशासन के साथसफ़ाईकर्म में लगे हुए हैं। दूसरों का मल ढो रहे हैं और वे मानते हैं कि वे कमा रहे हैं, क्योंकि समाज का दूषित तत्व दूर कर रहे हैं, लेकिन वह भी तो दार्शनिकों को रास नहीं आता न चचा!दिक़्क़त की बात ये है! मुझे मुक्तिबोध की पंक्तियां याद आ रही हैं, ‘जो है उससे बेहतर चाहिए, सफ़ाई के लिए मेहतर चाहिए’। मैं मेहतर और बेहतर बनना चाहता हूं। भाषा और विचारों की संस्कारशीलता नई पीढ़ी को देना चाहता हूं। ये फूहड़ता रास नहीं आ रही चचा! अब तुम्हें क्या बताऊं अपनी कमाई|

    wonderful comments!

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