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  • कुछ तो लॉलीपॉप दो   
  • कुछ तो लॉलीपॉप दो   

     

    —चौं रे चम्पू! आज संसद में ग्यारै बजे बित्त-मंत्री हमाऔ चित्त तौ खराब नायं करिंगे?

     

     

    —मैं उस समय टी.वी. नहीं देख पाऊंगा। एक स्कूल में बच्चों के बीच बसंत-पंचमी मनाऊंगा और देखूंगा कि उनके चित्त में क्या चल रहा है? वसंत उनके अन्दर क्या हिलोर और उमंग लाता है? चचा, जब भी मेरे दिमाग़ की गाड़ी बेमौसम की कीचड़ में फंस जाती है तो बच्चे उसके क्लच-ब्रेक अपने नेक तकनीकी उपायों से दुरुस्त कर देते हैं। दिल-दिमाग़ चल पड़ते हैं।

     

    —तौ, बित्त-मंत्री का कहिबे वारे ऐं, तू कछू नायं बतायगौ?

     

    —जो भी कहने वाले होंगे, उसका नमूना तो राष्ट्रपति के अभिभाषण से मिल ही गया है। सब कुछ अख़बारों में छप गया, टीवी पर दिख गया, उन बातों को उसी तरह से नहीं दोहराऊंगा, जिस तरह से उपराष्ट्रपति ने राष्ट्रपति के अंग्रेज़ी भाषण का हिंदी अनुवाद पूरा नहीं सुनाया, सिर्फ़ प्रारम्भ और अंत बता दिया। अब उपराष्ट्रपति जी की हिंदी को भी क्या दोहराना? राष्ट्रपति जी जब बार-बार रुमाल से अपना मुंह पोंछ रहे थे, बोलने में असुविधा हो रही थी, तो मुझसे उनका कष्ट देखा नहीं गया। मैंने टी.वी. को म्यूट कर दिया। लिखा हुआ तो आ ही रहा था, पढ़ता रहा। साइलैंट टीवी में मुझे दिखाई दिया कि उनके आगे आठ माइक्रोफ़ोन लगे थे। अब बताइए, आठ की क्या ज़रूरत थी? प्रेसवार्ता हो तो इतने माइक्रोफोन समझ में आते हैं। आठ शायद इसलिए लगाए कि ठाठ दिखाना है। व्हाइट हाउस से अमरीका का राष्ट्रपति भी जब बोलता है तो उसके आगे ढेर सारे माइक्रोफ़ोन लगे रहते हैं। शायद मैं गलत होऊं। लेकिन चचा, आप जो जानना चाहते हैं उसका उत्तर यह है कि मैं हूं मध्यमार्गी। दूरगामी सुपरिणाम सोचूं तो नोटबंदी के समर्थक अच्छे लगते हैं। निकट अतीत और वर्तमान के कष्ट देखूं तो नोटबंदी के विरोधी भी ठीक लगते हैं। एक रुदनशील बच्चे जैसी दशा है, जो नोटबंदी के कारण रोया था, अब ख़ुश करना है तो बजट में कुछ तो लॉलीपॉप दो। ग्यारह बजे के बाद लॉलीपॉप भी मिलेंगी और पॉपीलॉल भी।

     

    पॉपीलॉल का ऐ?

     

    —विपक्ष की चिल्लपों, और क्या!

     

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