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  • कोरा ज्ञान कोरा संवेदन   
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    —चौं रे चम्पू! आज बगीची पै बालकन्नै कहां-कहां ते तेरे फोटू निकारि कै दीवार सजाय दईं ऐं! बता अपने जनमदिन पै का भेंट चइऐ तोय?

     

    —आपका और बगीची का प्रेम काफ़ी है, चचा! ठीक छियालीस साल पहले, आठ फरवरी उन्नीस सौ इकत्तर को मैं बीस वर्ष का हुआ था और एम.ए. कर रहा था। उस दिन को मैं अपनी ‘समझ’ का जन्मदिन मानता हूं, क्योंकि विद्वान सुधीश पचौरी ने मुझे गजानन माधव मुक्तिबोध की एक पुस्तक ‘नई कविता का आत्मसंघर्ष तथा अन्य निबंध’ भेंट की थी। मैं अपने अंचल में हिंदी का सबसे मेधावी छात्र माना जाता था, परीक्षा में सबसे ज़्यादा नम्बर लाता था, लेकिन उस पुस्तक को पढ़कर मुझे लगा कि मैं कुछ नहीं जानता था! मुक्तिबोध के सिर्फ़ दो शब्दयुग्म थे, जिन्होंने मेरी चेतना की धुरी को फुलस्पीड घुमा दिया। संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदन। मुक्तिबोध मानते थे कि कोरे ज्ञान और कोरी संवेदना का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता। वह संवेदना बेकार है जिसकी जड़ों में पुख़्ता ज्ञान न हो और वह ज्ञान निरर्थक है जिसके मूल में संवेदनाओं की गीली हलचल न हो। उस पुस्तक ने एक देश-प्रेमी युवक को विश्व-दृष्टि प्रदान की। संसार के सारे मानव प्यारे लगने लगे। पुस्तक क्या मिली, ऐसा लगा जैसे किसी शिशु को मनोवांछित मिल गया हो। बहत्तर में मथुरा से एम.ए. करने के बाद दिल्ली आ गया। यहां अच्छे मित्र-साथी मिले, सत्यवती कॉलेज में अस्थाई नौकरी मिली। मैं रुचिपूर्वक मुक्तिबोध के साहित्य का अध्ययन करने लगा। ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’ की कविताओं को एक जुनून के साथ जीता था।

     

    —अब कौन्सी किताब चइऐ, बोल!

     

    —यह वर्ष मुक्तिबोध का जन्मशती वर्ष है। मेरे जन्म-दिन पर अगर बगीची के युवा मुक्तिबोध की जन्मशती मनाना प्रारम्भ करें, तो मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी। आप मुझे कुछ उपहार ही देना चाहते हैं तो बगीची के बालकों को इकट्ठा कर दीजिए, मैं मुक्तिबोध की कोई सी कविता पढ़ाना चाहता हूं। हो सकता है वे कोरी भावना और कोरे ज्ञान के खेल को समझ सकें। कुछ मैं भी उनसे समझूं।

     

    —मंजूर ऐ! सबके ताईं खीर मेरी तरफ ते।

     

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