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  • खड़ी हो सकें आसरे बिना 
  • खड़ी हो सकें आसरे बिना 

     

    —चौं रे चंपू! मजदूर औरतन्नै पतौ ऐ, आज महिला दिबस ऐ?

     

    —मजदूर नारियां, मजदूर पुरुषों से ज़्यादा काम करती हैं चचा! उन्हें कुछ नहीं मालूम कौन सा दिवस कब आता, कब जाता है। पति कभी कमाता, कभी सताता है। कितने तरह के काम करती हैं मज़दूर औरत, मैंने ‘बुआ भतीजी’ फिल्म में एक लंबा गीत लिखा था।

     

    —चल दो-चार बंद सुनाय दै!

     

    —’देख बंदे, देख बंदे, देख सके तो देख रे! बूआ एक रे, रूप अनेक रे! कहीं ये भेड़ चराती है, दूर से पानी लाती है, कहीं बेचे, बिंदी टिकुली, गली में टेर लगाती है। कहीं ये सब्जी बोती है, कहीं ये फूल पिरोती है, सड़क पर पत्थर कूटे कभी, कहीं ये पत्थर ढोती है, हाथ में पड़ जाती हैं ठेक रे। देख रे! कहीं ये डलिया बुनती है, कहीं ये रूई धुनती है, कहीं पर काम सिलाई का, कहीं ये पत्ते चुनती है। कहीं सुजनी का धागा है, कहीं लकड़ी की ठुकठुक है, बिकेगा माल सड़ेगा नहीं, लगी रहती ये धुक-धुक है। काम घर के कितने सारे, उन्हें तो कोई नहीं गिनता, सुबह से शाम हुई है यहां, लगी अब बच्चों की चिंता, लौट अब घर में रोटी सेक रे! देख रे! श्रमिक हैं जितनी महिलाएं, सभी की अलग कहानी है, एक के ज़रिए सब की बात, मुझे सब को समझानी है। ध्यान दें, क्योंकि इरादा नेक रे! देख रे!’

     

    —तौ तेरौ नेक इरादौ का ऐ?

     

    —इरादा ये है चचा कि जितनी भी ग़रीब, कामकाजी महिलाएं हैं, उन्हें आय-उपार्जक गतिविधियों के बारे में समझाया जाए कि काम का मतलब क्या होता है। बिचौलियों से बचकर, संगठित होकर कैसे अपनी कमाई को शोषण से बचाया जा सकता है। ‘श्रमिक हैं जितनी महिलाएं, बुआ उन जैसी ही तो है, खड़ी हो सकें आसरे बिना, शक्ति उनके भीतर जो है, बढ़े, बस, यही हमारी टेक रे। देख रे!’ प्रधानमंत्री ने जन-धन खाते तो खुलवा दिए, पर उन्हें भरने कोई नहीं आएगा। मजूरन अपने काम की महत्ता समझ ले और थोड़ी डिजिटल हो जाए, तो मुमकिन है ग़रीबी टल जाए।

     

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