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    हिन्दी गाने फैले हिन्दी की गाने वाले नहीं

     

    —चौं रे चम्पू! आज हिन्दी दिवस पै कित्ती जगै जायगौ भासन दैबे?

    —चचा, भाषण देते-देते भी एक ऊब सी हो गई है। हिन्दी के लिए रोने या गाने वाले लोग अब उदासीन पीठ पर बैठे हैं। सितम्बर में अचानक प्रेम उमड़ता है। अक्टूबर-नवम्बर में रामलीलाएं और लोकोत्सवधर्मिता! दिसम्बर आते-आते भूल जाते हैं कि सितम्बर में हिन्दी को लेकर कुछ संकल्प किए थे। फिर नया साल शुरू! गणतंत्र दिवस की परेड…. और सात-आठ महीने के इंतज़ार के बाद फिर वही हिन्दी दिवस! फिर वही गुलदस्ते,प्रमाण-पत्र, शॉल, नारियल, नाश्ते, और कार्यालयों के आंके-बांके आंकड़े। राजभाषा की विधि के विधान में दिल्ली, बिहार, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, झारखंड…  सब ’क’ क्षेत्र में आते हैं, जिसके लिए राजभाषा अधिनियम कहता है कि यहां शत-प्रतिशत कार्य हिन्दी में होना चाहिए। लेकिन दिल्ली के किसी मंत्रालय से जब पटना कोई चिट्ठी जाती है तो अंग्रेज़ी में जाती है। लखनऊ के सरकारी कार्यालय से अगर जयपुर कोई चिट्ठी जाती है तो अंग्रेज़ी में जाती है। विश्वविद्यालयों के कुल-सचिवों के कार्यालयों का कुल-कार्य अंग्रेज़ी में होता है। हिन्दी में भेजे गए पत्रों का उत्तर विलम्ब से मिलता है, इसीलिए लोग भाषाई-भावुकता का दामन छोड़कर अंग्रेज़ी के प्रति सहर्षत्व को अंगीकार करते हैं।

    —तौ जाकौ मतलब जे भयौ लल्ला, कै तू रोइबे वारेन में ऐ!

    —नहीं चचा! मैं रोने वालों में नहीं, गाने वालों में हूं। मैंने कितने ही विश्व हिन्दी सम्मेलनों में शिरकत की और प्रारम्भ से देखता आ रहा हूं कि सम्मेलन के अंत में कुछ प्रस्ताव पारित किए जाते हैं। उन प्रस्तावों में पहला प्रस्ताव होता है कि संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी को आधिकारिक भाषा बनाया जाए। तीन-चार साल बाद जब वह सम्मेलन पुनः होता है तो कोई पूछने वाला नहीं होता कि संकल्प तो इतने साल पहले लिया था, पूरा क्यों नहीं किया गया! क्या अड़चन है! सूरीनाम में हुए सातवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में कहा गया कि अगली बार तक हम इसे संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बना लेंगे। दुनिया भर से आए हुए हिन्दी प्रेमियों ने जोशो-ख़रोश के साथ तालियां बजाईं। आठवां न्यूयॉर्क में यूनाइटेड नेशंस के गर्भगृह में ही हुआ। बान की मून आए। पूरी-पूरी उम्मीद जगी कि अब तो हिन्दी संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बन ही जाएगी। भारत जैसे महादेश के लिए सौ करोड़ रुपए की राशि कोई ज़्यादा नहीं है और जब विश्व के एक सौ छत्तीस देशों में हिन्दी व्यवहार में लाई जा रही हो, छियानवै देशों का समर्थन पाना भी कोई बड़ी बात नहीं है।

    —तौ फिर कमी काए बात की ऐ?

    —विद्वान जाते हैं, मिलते हैं, सोचते हैं, प्रस्ताव रखते हैं, पर काम तो सरकार को करना है। सरकार ने क्यों नहीं किया? उसकी नज़र में भाषा का मसला कोई पेट से, विकास से जुड़ा हुआ नहीं है। जनतंत्र को बनाए रखने और अपनी सरकार को बचाए रखने के लिए भी ज़रूरी नहीं  है। सिर्फ वोट लेने के समय काम में आती है हिन्दी, इसीलिए हिन्दी की उदासीन पीठ का विस्तार हो रहा है। डॉ. यार्लागड्डा लक्ष्मी प्रसाद जी ने तो हिन्दी कीमुख्य सलाहकार समिति में कह दिया था कि हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनाने से पहले उसे अपने देश की आधिकारिक भाषा तो बना लीजिए।

    —तौ कहां गए नियम और अनुच्छेद?

    —सब हैं पर पता नहीं कौन से छेद हैं जिनमें से निकलकर अंग्रेज़ी विराट हो जाती है। चचा, मैं मानता हूं कि यह युग भाषाओं का परस्पर विरोध करने का युग नहीं है। अंग्रेज़ी का ज्ञान अंतर्राष्ट्रीय सम्पर्क और विकास के लिए ज़रूरी है। हिन्दी हमारे देश में अकाट्य रूप से राजभाषा और सम्पर्क भाषा है। पर लगता है जूं ने कसम खा रखी है कि रैंग कर कान तक जाएगी ही नहीं। अरे कान तक आए तो सही। कुछ ध्वनि तो करे! अपने कोमल पांवों में बांधकर, हिन्दी के घुंघरू, बजाए तो! पता नहीं कब सुविधाओं की केशराशि से निकलकर वह जूं कान की ओर प्रस्थान करेगी चचा! हम तो उसी के इंतज़ार में हैं।

     

    wonderful comments!

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