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    —चौं रे चंपू! कल्ल बिस्व हिंदी दिवस हतो, कछू बतायगौ?

     

    —विश्व हिंदी दिवस के पीछे मुझे सशक्त सकारात्मक चेतना से भरी हुई तरंगें उमंगों के साथ दिखाई देती हैं। सन पिचहत्तर में दस जनवरी को हमारे तत्कालीन उपराष्ट्रपति श्री बी.डी. जत्ती के नेतृत्व में नागपुर में प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन हुआ था। उस सम्मेलन का नारा था ‘वसुधैवकुटुंबकम’। सारी वसुधा एक परिवार है तो फिर उसे एक भाषा में ही बात करनी चाहिए। दस जनवरी को नागपुर में यह संकल्प लिया गया था कि वह विश्वभाषा हिंदी हो। विश्व हिंदी दिवस की महत्ता मेरी निगाह में चौदह सितम्बर से कहीं ज़्यादा है, चचा!

     

    —ऐसौ चौं कहि रह्यौ ऐ?

    —हमारे देश में हिंदी तो तीन सौ पैंसठ दिन की भाषा है। उसका दिवस क्या मनाना! अपने देश में मनाओ तो फ्रांसीसी दिवस, मंदारिन दिवस, स्पेनिश दिवस, जापानी दिवस, रूसी दिवस या अंग्रेज़ी दिवस। अगर हिंदी से जुड़ा कोई दिवस मनाना है तो दस जनवरी को ‘वसुधैवकुटुंबकम’ की आस्था वाला ‘विश्व हिंदी दिवस’ मनाओ।

     

    —संजुक्त राष्ट्र संघ नै तौ हिंदी स्वीकार ई नांय करी!

     

    —संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी को आधिकारिक भाषा बनवाने का यह रोदन प्रथम सम्मेलन से ही चल रहा है और मॉरीशस में होने वाले ग्यारहवें विश्व हिंदी सम्मेलन में भी चलेगा। चचा, तृतीय विश्व हिंदी सम्मेलन में महीयसी महादेवी वर्मा ने कहा था कि ‘भारत के सरकारी कार्यालयों में हिंदी के कामकाज की स्थिति उस रथ जैसी है जिसमें घोड़े आगे की बजाय पीछे जोत दिए गए हों।’ यानी हिंदी लगातार पीछे जा रही है। कमाल की बात है कि अवरोध के रोड़े अब आगे नहीं हैं। सामने हिंदी और भारतीय भाषाओं की कंप्यूटर निर्मित सौ लेन की सरपट सड़क है। सरकार भी सदिच्छा रखती है, तो फिर दरकार किस बात की है? अधिकारियों, उद्यमियों और राजनेताओं की उस चेतना की कि प्राथमिक शिक्षा से हिंदी पुन: पूरे देश में अनिवार्य कर दी जाय। अब विश्व हिंदी दिवस मनाना इसलिए ज़रूरी है चचा कि विश्वभर में वही संदेश गूंजे, ‘वसुधैवकुटुंबकम।’ प्यारे अधिकारीवृंद! हमें आपकी अंग्रेज़ी दक्षता पर गर्व है पर अब वक्त आ गया है कि घोड़े रथ के आगे जोत दिए जाएं!

     

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