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  • एकसंख्यक का बयान       
  • एकसंख्यक का बयान       

     

     

     

    —चौं रे चंपू! तेरे मन में कोई सवाल हतै का?

    —सवाल तो खूब सारे रहते हैं चचा, मेरा सवाल ये है कि धर्म एक निजी मामला है। निजता से निजता जुडती हैं। तभी अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक बन जाते हैं। मेरा सवाल ये है कि ये एकसंख्यक नहीं हो सकते क्या?

     

    —एकसंख्यक कैसे है जाएंगे जब ज़्यादा हैंगे तो?

     

    —एक संख्यक का मतलब ये है कि एक पहचान वाले सारे लोग। जैसे आधार कार्ड है, उसका एक नंबर है। वो नम्बर उस व्यक्ति की पहचान है। नाम से कुछ पता न चल पाए कि कौन सा धर्मं है ऐसा नाम हो। मैं ये नहीं कहता कि हर आदमी का नम्बर होना चाहिए। नम्बर तो कैदियों का होता है या पागलों के होते हैं। लेकिन नाम से धर्म पता लगते ही व्यक्ति निकट या दूर हो जाता है। इंसान अपनी इंसानियत को खोने लगता है। तेरे पास भी कुदरत का बनाया हुआ वही ढांचा है, जैसा दूसरे का है। कोई गोरा है, कोई सांवला है, कोई काला है। कोई पतला है, कोई मोटा लाला है। मैं ये मानता हूं कि यदि पता न लगे कि वो कौन है। तो उसके अन्दर बहुत सारे सवाल जन्म नहीं लेंगे। जो कि इस धरती पर अनावश्यक हैं। पर इंसान की अधिकतम उम्र तो सौ साल होती है। उसके बदले से इतनी जल्दी कुछ बदलता नहीं है। सदियों से पहले बहुत सारी सदियां हो चुकीं और उसके आगे अनेक सदियां रहेंगी, जब तक कि मनुष्य रहेगा। आगे क्या होगा, कैसा होगा, मैं ये मानता हूं कि बेहतरी की ओर बढ़ता है इंसान। नया विज्ञान आता है, नया ज्ञान आता है। नए सामाजिक सरोकार बनाते हैं। नई सरकार बनती है। नई सरकार इसलिए बनती है, चूंकि भरोसा नहीं कि ये कथनी और करनी में एकता बनी रहेगी या नहीं बनी रहेगी। अगर भरोसा हो कि हमने जिनको चुन लिया है वही बने रहें फिर तो राजतंत्र हो जाएगा, जनतंत्र के स्थान पर। पिछले किए हुए कामों में कुछ अच्छे थे, कुछ खराब थे। अच्छे कामों को बढाया जाए, खराबों को त्यागा जाए। तो पिछला वाला भी इतना खराब नहीं था, जितना मान लिया और आगे आने वाला भी उतना अच्छा नहीं होगा, जितना कि मान के चलते हैं। इसलिए ही दुबारा चुनाव होते हैं। चुनाव होना चाहिए इंसानियत के आधार पर। धर्म एक जबर्दस्त चुम्बक है। जिसकी एक परिधि होती है। उस परिधि के बाहर की गतिविधि त्याज्य लगने लगती है। धर्म परकोटा बनाता है, जो छोटा होता है। छोटे-छोटे बहुत सारे परकोटे बनेंगे तो पाने लिए अलग-अलग कोटे की मांग करेंगे। फिर छोटे-बड़े का सवाल होगा। लड़ाई होगी, झगड़ा होगा। सवाल ये ही है कि इनसे कैसे बचा जाए।

     

    —लल्ला भासन होंगे तो खटकिंगे ज़रूर। अब तुम स्टैंड ऐसो बनाओ, जामि हर बासन ढंग तौ धरा जामैं। खटर-पटर न होईं।

     

    —धोएंगे तब तो होगा ही होगा न चचा! धो के एक साथ रखेंगे और क्या करेंगे।

     

     

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