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  • एकता में भरापूरा शून्य

    —चौं रे चम्पू! कल्ल यूनैस्को में सून्य पै सैमीनार भयौ, तू चौं नायं गयौ?

    —चचा, उस समय मैं शून्य में था। इन दिनों मैं प्रायः शून्य में ही रहता हूं। यह तो निर्विवाद है कि शून्य का आविष्कार भारत में हुआ, इसलिए एक देशप्रेमी होने के नाते मुझे शून्य से प्यार होना चाहिए। शून्य से प्यार करना मेरा धर्म है, एक से प्यार करना मेरा कर्तव्य है।

    —जो सून्य ते प्यार नायं करैं बो देसदिरोही ऐं का?

    —मैं शून्य और एक का विरोध बर्दाश्त नहीं कर सकता। मेरी यह बाध्यता इसलिए भी है कि मैं कम्प्यूटर को प्यार करता हूं। वहां सिर्फ़ शून्य और एक होते हैं।

    –कम्पूटर में सून्य की बजाए दो होतौ और एक की बजाए आठ होतौ तौ कम्पूटर काम नायं कत्तौ का?

    —करता, अवश्य करता, क्योंकि कम्प्यूटर को तो ऑन-ऑफ़ का संकेत चाहिए, चिन्ह या संख्या कुछ भी रख दी जाय। कितनी बार ऑन किया, कितनी बार ऑफ़ किया, इसी से संचार होता है।

    —समझाय कै बता!

    —देखिए जैसे पड़ोस का कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका के साथ अपनी संकेत भाषा बना ले कि दो बार ऑन-ऑफ़ किया तो समझ लेना अकेला हूं, तीन बार करूं तो, पिताजी पास में बैठे हैं। चार बार करूं तो समझना पूरे परिवार के साथ हूं। प्रेमिका समझ जाएगी और प्रेमी के आसपास का बिंब उसके मस्तिष्क के कम्प्यूटर में बन जाएगा।

    —सो तौ ठीक ऐ, पर सून्य और एक ई चौं लए?

    —आपका प्रश्न उचित है चचा। मैं अपने शून्यवादी चिंतन से पाता हूं कि बाकी सब संख्याओं की रेखाओं में गोलाइयों और सीधाइयों के साथ मोड़-तोड़ हैं और देखा जाय तो मोड़-तोड़ ही इस दुनिया का जोड़-तोड़ है। कम्प्यूटर को सरलता से तत्काल लक्ष्यभेदन की सम्पन्नता चाहिए, पर आदमी टेढ़ी-मेढ़ी संख्याओं की तरह जटिल है। सरल रेखा में नहीं चलता। सरल रेखा में चलने वाले लोग तो अब्दुल कलाम जैसे होते हैं। जो चले एक बिन्दु से और पहुंचे एक बिंदु तक। कब ग़रीबी देखी, कब सर्वोच्च सत्ता का सुख लिया, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा।

    —बिंदु बी तौ सून्य ई ऐ!

    —जिस बिन्दु से चले, वह अगर शून्य था तो शून्य में जाने तक वे धन-शून्य ही रहे। कितने लोग लाखों-करोड़ों जोड़ते हैं। बहुत सारे लोग हैं, जिन्होंने एक से ही बहुत सारी सम्पत्ति बनाई। सरकार ने एक रुपए की ज़मीन दी और अस्पताल अरबों की कमाई कर रहा है। एक और शून्य दोनों सांकेतिक हैं।

    —गणित शून्य में नहीं, एक में है। शून्य का शून्य से गुणा-भाग, जोड़-घटाना कुछ भी करो शून्य ही रहता है, लेकिन एक-एक बूंद से समंदर बन जाता है। एक के सहारे शून्य में जो ताक़त आती है, वह अनंत तक जाती है। अरब-खरब, शंख-महाशंख तो धरती के सागरों जितने हैं, नील होते ही संख्याएं नील गगन में जाने लगती हैं, एक महाशून्य अनंत की ओर। वह महाशून्य इन्फिनिटी है। अंग्रेज़ी की आठ की संख्या को अगर पट्ट लिटा दो तो अनंत का संकेत करती है, जो दो शून्यों से बनती है। दरसल, आठ में दो शून्य नहीं हैं। उसका बिन्दु जहां से प्रारम्भ होता है गोल घूमकर और फिर गोल घूमकर उसी बिन्दु पर आकर मिल जाता है। मेरा जन्म आठ तारीख को हुआ था। मेरी प्रवृत्ति वही है।

    —तू तौ लल्ला बातन कूं घुमावै जादा ऐ?

    —आठ अंक की तासीर ही यही है कि वह घुमाने की कला में अनंत तक पारंगत होता है। चचा, मैं आपका अनंत हूं। शून्य की महिमा इसलिए भी मानता हूं क्योंकि शून्य डिपोजिट के करोड़ों खाते हमारे देश में खुल गए। उसमें एक रुपए की भी आमद हो जाए तो मैं समझूंगा कि देश एक कम्प्यूटर बन गया और शून्य को एक से मिलाकर ग़रीबों का उद्धार करने लगा। बस, संसद का शून्यकाल दलितों-किसानों-महिलाओं की आत्महत्याओं से मुंह न फेरे। कोई अगर शून्य की जय नहीं बोले सिफ़र की जय बोले तो परेशानी कैसी? सिफ़र भी एक शून्य है। सिफ़र और शून्य को लड़ा कर क्या हासिल होगा? एक की संख्या इसलिए अच्छी है, क्योंकि सिफर और शून्य को एक बनाने का संदेश देती है। गणितज्ञ, खगोलशास्त्री, आध्यात्मिक गुरु, शून्य की अलग-अलग व्याख्याएं करते हैं, पर मैं तो शून्य में एक देखता हूं और एकता में भरापूरा शून्य।

     

     

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