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  • दिल में है भारत का झंडा

    20110126 Dil mein hai bharat ka jhandaबहुत ज़ोर से रो रहा था बच्चा,

    परेशान हो गए चक्रधर चच्चा।

    उसे चुप कराने के लिए

    दिखाया पांच सौ का हरा नोट,

    लेकिन उसमें दिखा

    पता नहीं कौन सा खोट!

    हाथ से छीन लिया,

    छीन कर फेंक दिया,

    फेंक कर घूरने लगा,

    और ज़ोर-ज़ोर से

    भैंकरे पूरने लगा।

     

    फिर मैंने उसे

    हज़ार का नोट दिखाया नारंगी,

    अब तो और ज़ोर से रोया बेढंगी।

    मैंने सोचा—

    इसे चुप कराने की

    मुझमें शक्ति नहीं है,

    पर इतना तय है कि

    पैसे के प्रति

    बच्चे में कोई आसक्ति नहीं है।

     

    फिर मैंने सफेद कागज़

    और पैन देते हुए कहा—

    याड़ी!

    लो कल्लो चित्रकाड़ी।

    राजा बच्चे हो ना?

     

    उसने बंद किया रोना।

    ले लिया कागज़ पैन,

    चमक गए दोनों नैन।

    मैंने सोचा—

    हमारे सोच में है लोचा।

    कितना भ्रमात्मक है,

    बच्चा लालची नहीं होता

    रचनात्मक है।

     

    मैं बच्चे को देखूं

    बच्चा कभी इधर देखे

    कभी उधर,

    पैन को थामे हुए थे

    उसके दोनों अधर।

    कागज़ हाथ में थामे-थामे

    देखने लगा आकाश में।

    ये क्या सोच रहा है

    जान जाता काश मैं।

     

    अचानक उसमें आया उत्साह

    कल्पनाओं की दुनिया का

    वो शहंशाह

    बोला—

    अंकल-अंकल मैं इछ्पे

    एक गोल अंडा बनाऊंगा,

    लाओ वो नालंगी हले कागज बी दे दो

    ऊपल नीचे लख के

    भालत का झंडा बनाऊंगा।

     

    है न शानदार मेरा भतीजा,

    सोचिए इससे क्या निकला नतीजा?

     

    आज का बच्चा चाहता है

    दाम कमाना,

    और अर्थतंत्र को

    मज़बूत करने के इरादे से

    भारत के लिए नाम कमाना।

     

    हमारे दिमाग़ों में तो

    सौ तरह का वितंडा है,

    पर अभिनन्दन करिए

    उस बच्चे का

    जिसके दिल-दिमाग़ में

    भारत का झंडा है।

    wonderful comments!

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