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    ढूंढो कि अब कहां है

    (हिटलर आया और अचानक ग़ायब हो गया)

    पहरेदारों के

    सिर फोड़ता हुआ….

     

    यम के नियम

    पीछे छोड़ता हुआ….

     

    इतिहास की

    चट्टानी पर्तों को

    तोड़ता हुआ….

     

    पाताल की

    सुरंगों को

    मोड़ता हुआ….

     

    हिटलर

    भाग छूटा

    नर्क की जेल से

    और सीधे

    हमारी दिल्ली में

    आ गया रेल से।

     

    उतार फेंके

    उसने

    स्वास्तिक के निशान,

    छिपा दिया

    अपना शिरस्त्रान।

     

    लोगों से

    मूंछें छिपाता रहा,

    राम जाने

    कहां-कहां जाता रहा।

     

    वैसे बदला नहीं था

    अपने

    चाल-चलन में,

    अंतिम बार

    देखा गया

    खादी भवन में।

    wonderful comments!

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