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  • चीं-चपड़ और चीं-पौं    
  • चीं-चपड़ और चीं-पौं    

     

    —चौं रे चंपू! गरदभ-चरचा बंद भई कै नायं?

     

    —गर्दभ-चर्चा घर लेटी, बंद हो गईं मतपेटी। चचा, इंसान होकर बोलना न आए तो जानवर की तरह चुप रहना ज़्यादा अच्छा है। आत्मचिंतक, शांतिप्रिय, मितभाषी, अहिंसा-प्रेमी और धैर्यधन गधा सदा चीं-चपड़ नहीं करता, यदाकदा चीं-पौं करता है। ‘चपड़’ और ‘पौं’ में अंतर है। आदमी की चपड़-चपड़ में चिंतनशून्य चंचलता, चाटुकारिता और चोरी-चकारी आदि का भाव रहता है, लेकिन ‘पौं’ एक संदेश एवं चेतावनी-प्रधान ध्वनि-पद्धति है। गधा जहां भी होता है, स्वर्गिक आनंद में आत्मतुष्ट रहता है।

     

    —जे तौ कछु जादा ई है गई!

     

    —निर्भयजी की पंक्तियां हैं, ‘कोई कहता निपट-निरक्षर नीच गधा है, कोई कहता कूड़ा-करकट कीच गधा है, पर शब्दों के शिल्पी ने जब शब्द तराशे, उसने देखा स्वर्गधाम के बीच गधा है।’ देखिए, ‘स्वर गधा म’, स्वर्गधाम को खोल कर देखिए, गधा बीच में मिलेगा। न कोई अपेक्षा जताता है, न किसी उपेक्षा से स्वयं को सताता है। हां, बुद्धिमानी से कभी-कभी अड़ जाता है, कभी दुलत्ती जड़ जाता है। सोचिए तो सही, मृत्तिका उद्योग का सारा श्रेय प्रजापति ले गए। उत्पादन के लिए कच्चा माल, यानी, मिट्टी लाना और तैयार पका माल मार्केट तक पहुंचाना, भूमंडलीकरण के बाद यही कार्य आज सर्वोपरि है। गधा प्राय: मौन रहकर संसार के प्रजापतियों और रजकों के कॉल-सेंटर्स के कॉल्स रिसीव कर अपनी सेवाएं दे रहा है। जब धोबी के पास रहता है तो उसका नहीं, धोबी के कुत्ते का अपमान होता है। मैंने लिखा, ‘धोबी अपने कुत्ते को गधे के सामने दुत्कारता है, घाट पर कपड़ों के साथ फटकारता है। सुनार के कुत्ते के गले में सोने की माला है, कुम्हार ने अपने कुत्ते के लिए कुल्हड़ में दूध डाला है। लुहार के कुत्ते के पास सिकी हुई बोटी है, हलवाई के कुत्ते के पास मलाईदार रोटी है। जुलाहे के कुत्ते के पास खेलने के लिए ढेर है कपास का, मोची के कुत्ते के पास जूता है आदिदास का। इन सबके पास जुगाड़ है ऐशोआराम और ठाठ का, एक निरीह धोबी का कुत्ता ही है, घर का न घाट का।’ चचा! कुत्ते का भी अपमान क्यों करें! वफ़ा तो सीख लें उससे। हे बेवफ़ा मनुष्यो! इंसान होकर बोलना सीखो, या फिर जानवरों की तरह चुप रहो।

     

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