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  • चरखे, घंटियां और पोटलियां    
  • चरखे, घंटियां और पोटलियां    

     

     

    —चौं रे चम्पू! बता पिछले दिनन की कौन सी चीज याद ऐं?

     

    —चीज़ें बहुत हैं, पर चरखे, घंटियां और पोटलियां पक्की याद हैं। इंडियन ऑयल के कविसम्मलेन में दीप-प्रज्वलन के समय घंटे-घंटियों, दमामों और नगाड़ों की ध्वनियां गूंजीं। क्या समां बंधा! फिर हर कवि को एक-एक चरखा भेंट किया गया। बताया गया कि चरखे छोटे हैं तो क्या हुआ इन पर सूत काता जा सकता है। पूरे कविसम्मेलन के दौरान, सामने रखे अपने चरखे पर मैं कविताएं कात रहा था, बैठे-बैठे। इसरो के वैज्ञानिकों ने एक सौ चार उपग्रह छोड़ कर जो विश्व-कीर्तिमान स्थापित किया, उसकी सराहना में वह साइकिल और बैलगाड़ी याद आईं जिन पर उपग्रहों को रखवा कर विक्रम साराभाई रॉकेट तक ले जाते थे। इसरो के बाद ख़ुसरो याद आए। इसरो ख़ुश, ख़ुसरो दुखी। ख़ुसरो की क़व्वालियां पाकिस्तान की लाल कलंदर की दरगाह में भी गाई जाती रही होंगी। भयंकर विस्फोट! सही संख्या कौन जाने, मरे और घायल हुओं की! पहली बार संगीत के वाद्य टूटे-फूटे दिखाई दिए। हारमोनियम, तबले, सारंगी, नगाड़े और दमामे। मैं अपने चरखे पर कविता-कताई कर रहा था। दरगाह पर कल्पना में दिखा एक अर्धविक्षिप्त फ़कीर। लाशों के बीच बैठकर गा रहा था, ‘बमाबम ध्वस्त कलंदर! गिनो लाशां दे नंबर! लाल हुई, होओओ लाल हुई दरगाह, स्वजन ढूंढें लालन! चिथड़ां दा, लाशां दा, लगा अम्बार कलंदर। बमाबम ध्वस्त कलंदर!’

     

    —और पोटली?

     

    —ओह नारंगी पोटलियां! दरसल, दिल्ली में आयोजित ‘जश्न-ए-रेख़्ता’ में प्रेममार्गी उर्दू-हिंदी अदीबों का जमावड़ा लगा था। पिछले वर्ष की तुलना में तीन गुने प्रतिभागी थे। आईजीएंसीए के प्रांगण के सघन वृक्षों पर सैकड़ों-हज़ारों घंटियां और नारंगी पोटलियां टंगी थीं। घंटियों का टंगना समझ में आता है, क्योंकि जश्न-ए-रेख़्ता का तराना कहता है, ‘मंदिर की घंटियों में, बोले अज़ां का जादू’, पर पोटलियों में क्या था? शायरी कातने की रुई? बमाबम तो हो नहीं सकता, दमादम मस्त कलंदर होगा। मैंने अगला मिसरा काता, ’इस पोटली में क्या है, ख़ुसरो, कबीर, दादू।’ मैंने अपनी काती हुई दूसरी कविताएं भी पोटलियों में डाल दीं। डाल से लटकी पोटलियों की गांठें खोल-खोलकर। फिर जश्न-ए-रेख़्ता के इश्क़े-हक़ीक़ी और इश्क़े-मजाज़ी का मज़ा लेता रहा।

     

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